
हिन्दू (ईश्वरीय)राष्ट्र की शिक्षाप्रणाली कैसी होगी ?, यह प्रश्न कुछ लोग पूछते हैं । उसका उत्तर है, जिस प्रकार नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में १४ विद्याएं और ६४ कलाएं सिखाए जाते थे,उसी प्रकार की शिक्षा दी जाएगी; परंतु उनमें इस माध्यम से ईश्वरप्राप्ति कैसे करनी है ?, यह भी सिखाया जाएगा ।
हिन्दू राष्ट्र में सब कानून धर्म पर आधारित होंगे । अतः उनमें संशोधन की आवश्यकता नहीं होगी । इनके पालन से समाज अपराध-मुक्त होकर साधनारत होगा !
राजनीतिक क्षेत्र के कार्यकर्ताआें के विषय माया के होने से उनका लेखन लंबी अवधि तक नहीं टिकता । इसके विपरीत आध्यात्मिक क्षेत्र का लेखन लंबे समय अथवा युगों-युगों तक टिकता है, उदा. वेद, उपनिषद, पुराण इत्यादि ।
जो हिन्दू धर्म पर टीका-टिप्पणी करते हैं,उनके जैसा अज्ञानी इस जगत में कोई नहीं हैं !
युग-युग से संस्कृत का व्याकरण वही है । उसमें किसी ने कुछ भी परिवर्तन नहीं किया । इसका कारण यह कि वह पहले से ही परिपूर्ण है । इसके विपरीत जगत की सभी भाषाआें का व्याकरण परिवर्तित होता रहता है ।
प्रवचन, व्याख्यान और वर्तमान विषयों पर ग्रंथ-लेखन में जिनका जीवन जाता है,उनके नाम और कार्य उनके जीवित होने तक रहते हैं । इसके विपरीत शोध करनेवालों के नाम और कार्य आनेवाली अनेक पीढियों को ज्ञात होते हैं ।
निर्गुण ईश्वरीय तत्त्व से एकरूप होने पर ही खरी शांति अनुभव कर सकते हैं। ऐसा होने पर नेता जनता को साधना न सिखाकर, ऊपरी तौर के मानसिक स्तर के उपाय करते हैं, उदा. जनता की अडचनें दूर करने हेतु ऊपरी तौर के प्रयत्न करना, मानसिक चिकित्सालय स्थापित करना आदि । -(परात्पर गुरु)डॉ.आठवले
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के ओजस्वी विचार