सर्वोच्च न्यायालय का निरीक्षण

नई दिल्ली – ए.आई. द्वारा उत्पन्न किए गए बनावटी कानूनी उदाहरणों का उपयोग धोखादायक है । यह धोखा भोपाल गैस त्रासदी जैसी विषेली वायु रिसाव की घटना जितना ही गंभीर है । इसलिए ए.आई. का उपयोग मानवीय निरीक्षण के साथ ही किया जाना चाहिए, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने एक प्रकरण में कहा । न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिंह एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने ‘नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल’ के निर्णय को निरस्त करते हुए यह टिप्पणी की । उन्होंने कहा कि ए.आई. द्वारा निर्मित किए गए बनावटी एवं अस्तित्वहीन निर्णयों को न्यायलयों में सत्य के रूप में प्रस्तुत करना न्यायिक प्रणाली को भीषण हानि पहुंचाता है । ऐसे प्रकरणों में न्यायलयों को कोई सौम्यता नहीं दिखानी चाहिए ।
न्यायालय ने ए.आई. के संबंध में क्या कहा ?
१. (ए.आई. द्वारा दी गई) बनावटी कानूनी जानकारी प्रारूप में छोटी‑सी बात लग सकती है; परन्तु यह बहुत धोखादायक होती है । इससे न्यायिक प्रक्रिया भ्रष्ट होती है एवं न्यायालय के निर्णयों पर जनता का विश्वास कम हो सकता है ।
२. न्यायालय ए.आई. के विरोध में नहीं है । समस्या ए.आई. में नहीं, अपितु ए.आई. द्वारा निर्मित की गई मिथ्या आभासी सूचनाओं को सत्य बताकर प्रस्तुत करने में है । इसलिए ए.आई. का उपयोग सावधानी से, जांचकर एवं मानवीय निरीक्षण के साथ ही किया जाना चाहिए ।
३. ए.आई. का उपयोग किया जा सकता है; पर अंतिम निर्णय एवं सत्यापन सदैव मानवीय हस्तक्षेप द्वारा ही किया जाना चाहिए ।
४. ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ को एक समिति गठित करनी चाहिए । यह समिति ऐसे नियम निश्चित करेगी जिनसे न्यायलयों में ए.आई. द्वारा उत्पन्न बनावटी एवं भ्रामक जानकारी प्रस्तुत करने को बंधित किया जा सके एवं नियम तोडने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा सके ।
प्रकरण क्या है ?
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल, जो कंपनियों के परस्पर विवाद एवं दिवालियापन से जुडे प्रकरणों का निपटारा करता है, ने एक प्रकरण में अपने निर्णय का समर्थन करने हेतु कुछ कानूनी प्रकरणों का संदर्भ दिया था, जिनमें से कई वास्तव में उपस्थित ही नहीं थे । वे संदर्भ ए.आ. ई. का उपयोग करके बनाये गए थे । इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की गयी, जिनके संदर्भ में न्यायालय ने उपर्युक्त टिप्पणियां की।
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