(‘डिजिटल अरेस्ट’ का अर्थ: अपनी अवास्तविक पहचान दिखाकर ऑनलाइन बंदी बनाना)

गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) – राष्ट्रीय अन्वेषण संस्थान एवं आतंकवाद रोधी पथकके अधिकारी होने का ढोंग करके ठगों ने एक वृद्ध व्यक्ति से ५ लाख रुपये की ठगी की । ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर आरोपियों ने पीडित वृद्ध को दो दिनों तक लगातार निरीक्षण में रखकर यह राशि उगाही की ।
आरोपियों ने किस प्रकार रचा षड्यंत्र ?
स्वयं को राष्ट्रीय अन्वेषण संस्थान का अधिकारी बताने वाले एक व्यक्ति ने धनुषधारी तिवारी के भ्रमण भाष पर १७ फरवरी को संपर्क कर कहा कि उनके आधार कार्ड का उपयोग करके जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से संबंधित बैंक खाता खुलवाया गया है । साथ ही उसे कहा गया कि तिवारी को पूछताछ के लिए पुणे में राष्ट्रीय अन्वेषण संस्थान के कार्यालय में उपस्थित होना होगा । तिवारी ने तुरंत पुणे आने में असमर्थता बतायी तो एक अन्य व्यक्ति ने स्वयं को गोरखपुर आतंकवाद रोधी पथक का अधिकारी बताकर तिवारी से संपर्क किया । उसके उपरांत व्हाट्सऐप कॉल पर लगातार संपर्क रखा गया । पूछताछ के नाम पर तिवारी दम्पत्ति को कहा गया कि ‘किसी अन्य से संपर्क न करें एवं भ्रमणभाष लगातार शुरू रखें’, एवं उन्हें मानसिक दबाव में रखा गया । साथ ही कहा गया कि पूछताछ पूरी होने तक ‘सुरक्षा राशि’ के रूप में ५ लाख रुपये जमा कराए जाए । डर के कारण तिवारी ने अपना सावधि जमा तोडकर यह राशि आरोपियों के बताए खाते में भेज दी ।
पैसे मिलने के उपरांत आरोपियों ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एवं भारत सरकार की राजमुद्रा लगाकर बनावटी प्रपत्र व्हाट्सऐप पर भेजकर विश्वास जीतने का प्रयास किया । दूसरे दिन उनके सभी भ्रमणभाष नंबर बंद होने पर तिवारी को अपनी ठगी होने का अनुभव हुआ । इसके उपरांत उन्होंने ‘साइबर हेल्पलाइन’ नंबर १९३० पर परिवाद प्रविष्ट कराया । प्रारंभिक जांच के उपरांत यह प्रकरण साइबर क्राइम थाना में पंजीकृत किया गया है ।
जांच कर कार्रवाई करेंगे ! – पुलिस अधीक्षक
पुलिस अधीक्षक (साइबर अपराध शाखा) सुधीर जैस्वाल ने कहा कि इस प्रकरण में बैंक खाते, भ्रमणभाष क्रमांक एवं डिजिटल लेनदेन की सत्यापन प्रक्रिया जारी है एवं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी ।
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