
कुंडली अर्थात हमारे जन्म के समय आकाश की ग्रहस्थिति का मानचित्र ! उसमें हम परिवर्तन नहीं कर सकते । वह हमारे जीवन के अंत तक वैसी ही बनी रहती है; परंतु हम वास्तु में अपने लिए अनुकूल परिवर्तन कर उसे लाभकारी बना सकते हैं । इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी वास्तु को हमने शुभ कर लिया, तो उसमें रहनेवाले सभी को १०० प्रतिशत अच्छे परिणाम ही मिलेंगे; परंतु उसका लाभ हमें निम्नांकित प्रकार से हो सकता है –
१. कुंडली में काल एवं वास्तु भी अनुकूल हो, तो उनका एकत्रित परिणाम निश्चित ही शुभ फलदायी होता है ।
२. यदि कुंडली का गोचर दूषित हो तथा वास्तु भी दोषपूर्ण हो, तो मिलनेवाले अनिष्ट परिणामों की तीव्रता बढी हुई दिखाई देती है ।
३. यदि कुंडली में ग्रहगोचर अच्छा है; परंतु वास्तु दूषित है, तो कुंडली के कारण मिलनेवाले अच्छे परिणाम हमें तब तक अच्छे नहीं मिलेंगे, जब तक हम उस वास्तु में रह रहे हैं ।
४. इसके विपरीत, यदि काल अनिष्ट है; परंतु वास्तु निर्दाेष है, तो हमें उस काल में आनेवाली समस्याओं का न्यूनतम सामना करने के लिए बल मिलता है, साथ ही संघर्ष करने के लिए भी बल मिलता है । अत: वास्तु को निर्दाेष बनाना तथा कुछ दोष हों, तो उनका निवारण करना निश्चित रूप से हमारे हाथ में होता है ।
– श्री. श्रेयस पिसोळकर
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