आपत्तिजनक वीडियो हटाने का आदेश दिया।
नई दिल्ली – न्यायालयीन निर्णय एवं संस्थाओं की वस्तुनिष्ठ आलोचना करने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है, तथापि सामाजिक माध्यमों का उपयोग न्यायाधीशों की छवि खराब करने के लिए अथवा न्यायालय की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं किया जा सकता, ऐसा दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया । न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायाधीशों पर झूठे एवं आधारहीन आरोप लगाने से न्यायालय की अवमानना सिद्ध हो सकती है ।
१. दिल्ली के सैदुलाजाब में हुई भुवन की दुर्घटना के उपरांत सामाजिक माध्यम के उपयोगकर्ता डॉ. कपिल ककर ने सामाजिक माध्यमों में कुछ वीडियो प्रसारित किए थे ।
२. इसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर गंभीर एवं आपत्तिजनक आरोप लगाए गए थे । उस पर ‘दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन’ने डॉ. ककर के विरुद्ध आपराधिक याचिका प्रविष्ट की ।
३. इस याचिका पर सुनवाई करते समय न्यायाधीश नीना बंसल एवं न्यायाधीश मधू जैन की खंडपीठ ने इस पर तीव्र अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए डॉ. ककर को नोटिस दिया ।
४. वीडियो में लगाए गए आरोप न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करनेवाले हैं, ऐसा न्यायालय ने कहा । इसके साथ ही न्यायालय ने इंस्टाग्राम, फेसबुक, यू ट्यूब एवं एक्स, इन सामाजिक माध्यमों को इन वीडियोज को तुरंत हटाने का आदेश दिया ।
५. न्यायालय ने जिन सामाजिक माध्यमों पर ये वीडियाे प्रसारित किए गए हैं, उन खातों की (‘एकाऊंट्स’की) जानकारी तथा अन्य तकनीकी विवरण न्यायालय में प्रस्तुत करने का भी आदेश दिया ।
६. सामाजिक माध्यम चलाने वाले प्रतिष्ठान ऐसी आपत्तिजनक सामग्री के विषय में मौन नहीं रह सकते । ऐसे प्रकरणों में न्यायालय के आदेश की प्रतीक्षा किए बिना इन प्रतिष्ठानों को स्वयं ही कार्यवाही करना अपेक्षित है । न्यायतंत्र की प्रतिमा धूमिल करने का अथवा उसकी स्वतंत्रता को क्षति पहुंचाने का प्रयास सहन नहीं किया जाएगा, ऐसी चेतावनी भी न्यायालय ने दी ।

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