देवी मातंगी आदिशक्ति की प्रधानमंत्री होने के कारण उन्हें ‘राजमातंगी’ कहा गया है । वर्तमान में संपूर्ण विश्व पर युद्ध का संकट मंडरा रहा है । ऐसे समय में तपोभूमि भारत की रक्षा के लिए ‘राजमातंगी’ देवी का कवच अत्यंत आवश्यक है । दशमहाविद्याओं में से नौंवीं देवी ‘राजमातंगी’ देवी वाणी शुद्ध करनेवाली एवं ज्ञान प्रदान करनेवाली देवी हैं । भगवान श्रीविष्णु के दशावतारों के समय भी दशमहाविद्याएं कार्यरत रहती हैं । श्रीराम अवतार में राजमातंगी का तत्त्व कार्यरत था, इसीलिए अब रामराज्य की स्थापना के लिए हमें राजमातंगी देवी की उपासना की आवश्यकता है । मातंगी, दशमहाविद्याओं में से नौंवींविद्या (महाविद्या) हैं । ऐसा माना जाता है कि मातंगी ‘मातंग शिव’ की पत्नी हैं । वे ‘मातंग भैरव’ के रूप में प्रसिद्ध हैं । वास्तविक अर्थ में वे ‘मातंग शिव’ की ही शक्ति हैं । वे ‘वरदायिनी’ हैं, जो भक्तों को तत्काल संपत्ति एवं समृद्धि प्रदान करती हैं । राजमातंगी देवी साक्षात आदिपराशक्ति का अवतार हैं ।
जब नारदजी ने ब्रह्मदेवजी से मातंगी की उत्पत्ति के विषय में पूछा, तब ब्रह्मदेवजी ने उत्तर दिया , ‘मातंग ऋषि ने १० सहस्र (१०,०००) वर्षों तक कठोर तपस्या की थी । उनके तप से प्रसन्न होकर आदिपराशक्ति ‘मातंगी’ के रूप में मातंग ऋषि के सम्मुख प्रकट हुईं । त्रिपुरासुर का वध करने के लिए भगवान रुद्र ने भी इन्हीं मातंगी देवी की उपासना कर उनसे उस कार्य के लिए प्रार्थना की थी ।’
– श्री. चेतन राजहंस (७.५.२०२६)
‘देवी भागवत पुराण’ और ‘महाभागवत पुराण’ के अनुसार दशमहाविद्याओं की उत्पत्ति की एक कथा है ।

एक बार दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था ; परंतु उन्होंने अपनी पुत्री सती और जामाता (दामाद) शिव को आमंत्रित नहीं किया था । जब सती को यह ज्ञात हुआ, तब उनके मन में अपने पिता के घर जाने की तीव्र इच्छा हुई । उन्होंने भगवान शिव से जाने की अनुमति मांगी; परंतु शिव ने बिना निमंत्रण के जाना उचित न होने की बात कहकर मना कर दिया । सती ने बार-बार विनती की; परंतु शिव अपने निर्णय पर अटल थे । सती को लगा कि शिव उन्हें केवल पत्नी के रूप में देख रहे हैं व उनका मूल ‘शक्ति’ स्वरूप भूल गए हैं । शिव को शक्ति की अनुभूति कराने के लिए सती ने स्वयं को १० भिन्न-भिन्न रूपों में विभाजित कर लिया । शिव जिस-जिस दिशा में जा रहे थे, उस प्रत्येक दिशा में एक देवी खडी थीं । जब शिव ने दसों दिशाओं से स्वयं को इन १० शक्तियों से घिरा हुआ देखा, तब उन्हें आभास हुआ कि सती केवल उनकी पत्नी नहीं हैं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल आदिशक्ति हैं । शिव ने सती से क्षमा मांगी तथा उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी ।
इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सृष्टि की प्रत्येक अवस्था, चाहे वह सौंदर्य हो अथवा दुःख हो, दरिद्रता हो अथवा संपन्नता, यह उस एक ही आदिशक्ति के रूप हैं । शिव को दिशा दिखाने का और उनकी रक्षा करने का कार्य यह महाविद्याएं करती हैं ।
– श्री. चेतन राजहंस (७.५.२०२६)
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण होना इस बात का परिचायक है कि रामराज्य के अवतरण का समय आ गया है । जब त्रेतायुग में रामराज्य का अवतरण हुआ था , तब श्री राजमातंगी देवी का तत्त्व कार्यरत था और अब जब कलियुग में रामराज्य की स्थापना का समय आया है , तब देश की आर्थिक राजधानी में श्री राजमातंगी देवी का महायज्ञ संपन्न हुआ । यह ईश्वरीय संकेत है कि रामराज्य का सूर्योदय अब दूर नहीं है ।
– श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था (५.५.२०२६)

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