
वेटिकन सिटी – कैथोलिक चर्च के इतिहास के एक अंधकारमय अध्याय को स्वीकार करते हुए पोप लियो ने चर्च की दासता की विरासत के विषय में औपचारिक रूप से क्षमा याचना की है । उन्होंने इसे ‘ईसाई स्मृति में एक गहरा घाव’ संबोधित किया है ।
𝗖𝗵𝘂𝗿𝗰𝗵’𝘀 𝗗𝗮𝗿𝗸 𝗣𝗮𝘀𝘁 𝗔𝗰𝗸𝗻𝗼𝘄𝗹𝗲𝗱𝗴𝗲𝗱 – 𝗪𝗵𝗮𝘁 𝗔𝗯𝗼𝘂𝘁 𝗙𝗼𝗿𝗰𝗲𝗱 𝗖𝗼𝗻𝘃𝗲𝗿𝘀𝗶𝗼𝗻𝘀 𝗧𝗼𝗱𝗮𝘆?
Pope Leo has apologised for the Catholic Church’s role in slavery, where millions of Africans were forcibly taken to the Americas and other… pic.twitter.com/tVpbMNQlKK
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) May 26, 2026
एक महत्वपूर्ण भाषण में पोप ने स्वीकार किया कि शताब्दियों से चर्च के कुछ व्यक्तियों तथा संस्थाओं ने मानवीय गरिमा के विरुद्ध दासता की व्यवस्था को न केवल मूक सहमति दी, अपितु कुछ अवसरों पर उसका समर्थन भी किया । ये कृत्य ‘अमानवीय’ तथा ‘ईसाई शिक्षाओं के पूर्णतः विपरीत’ हैं ।
पोप लियो ने कहा कि ‘हम ईश्वर के सम्मुख एवं जिनके पूर्वजों को इस अन्याय का आघात सहना पडा, ऐसे लोगों के सम्मुख यह स्वीकृति देते हैं कि चर्च के इतिहास के इस कालखंड ने मानवता को कलंकित किया है । ईसाई विश्वास के मूल आधार रहे बंधुत्व एवं समानता की शिक्षा को एक बडा आघात लगा ।
त्रुटियों के लिए प्रायश्चित करना है !
चर्च को भूतकाल की त्रुटियों का प्रायश्चित करना है तथा भविष्य में अधिक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए प्रयास करना है, ऐसा पोप ने स्पष्ट किया । उन्होंने कहा कि केवल क्षमा मांगना पर्याप्त नहीं है, अपितु हमें इस इतिहास से शिक्षा लेकर वर्तमान समय में अस्तित्व में रहे आधुनिक दासता के रूपों के विरुद्ध संघर्ष करना होगा, ऐसा आवाहन भी उन्होंने किया ।
लाखों अफ्रीकी लोगों को बलपूर्वक दास बनाकर अमेरिका सहित अन्य महाद्वीपों में ले जाया गया था !
पोप ने अपने भाषण में विशेष रूप से अटलांटिक दासता व्यापार का उल्लेख किया, जिसमें लाखों अफ्रीकी लोगों को बलपूर्वक दास बनाकर अमेरिका सहित अन्य महाद्वीपों में ले जाया गया था । चर्च ने इस अन्याय के विरुद्ध स्वर उठाने के स्थान पर अनेक बार मौन रहना उचित समझा, यह त्रुटि होने की बात उन्होंने स्वीकार की ।
ईसाई मिशनरियों द्वारा भारत में तथा अन्य स्थानों पर भी प्रलोभन दिखाकर अथवा छल से हो रहे धर्मांतरण के विरुद्ध पोप का बोलना आवश्यक है । साथ ही ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए वे प्रयास क्यों नहीं करते, यह भी उन्हें बताना चाहिए !
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