वर्तमान में ऊर्जा के सूत्र पर चल रहे युद्ध में, ईरान एंव अन्य खाडी प्रदेशों में स्थित तेल के भंडारों पर हो रहे आक्रमणों के कारण बडे स्तर पर तेल एवं प्राकृतिक वायु ऊर्जा की हानि हो रही है । बीच के समय में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बंद किए जाने से अनेक देशों की तेलवाहक नौकाएं इस मार्ग पर फंस गईं, जिसके कारण विश्व के सामने ऊर्जा का बडा संकट उत्पन्न हुआ । भारत भी इसका अपवाद नहीं था; परंतु भारत का सशक्त नेतृत्व, उचित विदेशनीति, कूटनीतिक प्रयास तथा भारत की नौसेना के सुरक्षा घेरों के कारण कुछ तेलनौकाएं भारत पहुंची, ऐसा सरकार की ओर से बताया गया । इसलिए जनता को प्रतिदिन वाहन चलाने हेतु पर्याप्त ईंधन तथा घरेलु उपयोग के लिए ‘एल.पी.जी.’ गैस की आपूर्ति वर्तमान में तो हो रही है; परंतु युद्धकाल में यह स्थिति कभी भी बदल सकती है । इसके अतिरिक्त भारत में ईंधन की जमाखोरी कर ईंधन के मूल्य बढानेवाले कुछ महामानव तो हैं ही ! जिससे जनता को किसी भी स्थिति का सामना करना पड सकता है । इसलिए ऊर्जा सुरक्षा एवं अति आवश्यक आपूर्ति के साथ ऊर्जा की बचत करना भी उतना ही आवश्यक है । इनमें से सुरक्षा एवं आपूर्ति के कर्तव्य का सरकार उचित निर्वहन कर ही रही है; परंतु ऊर्जा बचत हम नागरिकों का ही कर्तव्य है । इसकी चर्चा इस लेख में की गई है ।
१. तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री द्वारा जनता को किए गए आवाहन का पुनः अनुकरण किया जाना चाहिए !
वर्ष १९६५ के पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जनता को ‘जय जवान, जय किसान’ का मूलमंत्र देकर २ मोर्चाें पर युद्ध लडने के लिए कहा था । पहला युद्ध सीमा पर शत्रु के साथ तथा दूसरा युद्ध देश के भीतर उत्पन्न अन्न के अभाव के साथ ! उसके लिए उन्होंने किसानों को बडे स्तर पर अनाज उगाने के लिए प्रोत्साहन दिया । साथ ही उन्होंने अन्न के अभाव का सामना करने के लिए जनता को सप्ताह में न्यूनतम एक बार उपवास रखने का आवाहन भी किया था । उनकी विशेषता यह थी कि वे केवल आवाहन कर शांत नहीं बैठे, अपितु उन्होंने इसका कार्यान्वयन कर जनता को प्रेरणा दी थी । विदेशी सहायता पर निर्भर न रहकर समस्या का अपने बलबूते पर सामना करने का धैर्य उन्होंने उस समय भारतीयों को दिया । वर्तमान में ‘जय जवान, जय किसान’ के साथ ‘जय तकनीक’ का भी उद्घोष करना पडता है; क्योंकि वर्तमान में अन्न-अनाज की अपेक्षा हम तकनीक हेतु आवश्यक ऊर्जा के लिए अन्य देशों पर निर्भर हैं । इसलिए हमें युद्धकाल में और अधिक समस्याओं का सामना करना पड सकता है । इस दृष्टि से पाकिस्तान के विरुद्ध लडे गए युद्ध में लालबहादुर शास्त्री ने जिस प्रकार से नागरिकों को एकजुट होकर देश की साधनसंपत्ति का उपयोग मितव्ययिता के साथ तथा दायित्व के साथ करने का आवाहन किया था, उस आवाहन का पुनः एक बार अनुकरण करने का समय अब आ चुका है ।
२. युद्धकाल का सामना करने के लिए तैयारी के रूप में आज ही कृति करना आवश्यक !

आज हम सभी को अनियंत्रित रूप से आचरण करने की आदत होने से समस्या की गंभीरता हमारे ध्यान में नहीं आती । जिस कारण हम ‘आज मेरे पास है, तो उसका उपभोग कर लेते हैं । कल का कल देखेंगे ।, यह विचार करते हैं । धनवान व्यक्ति कहता है, ‘मेरे पास प्रचुर मात्रा में है, तो मैं अन्यों का विचार क्यों करूं’; जबकि गरीब व्यक्ति कहता है, ‘ऐसा करने से मेरी स्थिति में क्या परिवर्तन आनेवाला है ?’ इस संपूर्ण विचारप्रक्रिया में स्वयं की भूमिका स्वकेंद्रित होने से समष्टि का विचार हमारे मन में नहीं आता तथा आया भी, तो वह अल्प समय तक ही टिका रहता है; परंतु संत-महात्मा कृपालु होते हैं, उन्हें सभी जीवों की चिंता होती है; इसलिए वे लगन के साथ युद्ध के विषय में लोगों को सचेत करते हैं अथवा आपातकाल से संबंधित सूचित कर उस प्रकार से तैयारी करने के लिए कहते हैं । अतः उनके आज्ञापालन के रूप में तो हमें कृति का आरंभ करना चाहिए ।
आप कुछ समय मन में यह विचार कर देखिए । हमें उपवास की आदत नहीं है, ऐसे में हमें २-३ दिन भोजन ही नहीं मिला, तो क्या होगा ? चाय नहीं पी, तो हमें दिन भर सिरदर्द का कष्ट होता है, कल यदि युद्धकाल में हमारे घर तक दूध नहीं पहुंचा तो ? हमें पास में भी कहीं जाना हो, तो हम वाहन का उपयोग करते हैं; परंतु यदि कल हमें पेट्रोल अथवा डीजल उपलब्ध नहीं हुआ, तो क्या हममें कुछ दूरी तक पैदल चलने की क्षमता है ? अथवा आज हम पर साइकिल चलाने की स्थिति आती है, तो क्या हमारे घुटने उसके लिए तैयार हैं ? इन विचारों से ही हमें इस तैयारी का मर्म ध्यान में आएगा । आज भले ही स्थिति नियंत्रण में हो, तब भी हमें बचत की आदत न होने से युद्धकाल में हमें और अधिक कष्ट हो सकता है । आज एक दिन भी यदि हमारा चल-दूरभाष (मोबाइल) कुछ कारणवश खराब हुआ अथवा सेवाप्रदाता प्रतिष्ठान में कुछ तकनीकी समस्या आकर चल-दूरभाष सेवा बंद हुई, तो हमारी स्थिति भ्रमित होने जैसी होती है । ऐसा यदि निरंतर कुछ दिन तक हुआ, तो क्या होगा ? इस दृष्टि से प्रसंग के अध्ययन के रूप में इन बातों का उपयोग मितव्ययिता से करना, बचत करना, स्वयं की शारीरिक क्षमता उपयोग में लाने का प्रयास करना जैसी कृतियों से हमें ऊर्जा की बचत का मार्ग अपनाना होगा ।
हम घर पर ही किस प्रकार ऊर्जा की बचत कर सकते हैं ?
देशसेवा के रूप में हम अपने स्तर पर किस प्रकार से ऊर्जा की बचत कर सकते हैं, इसका चिंतन आप सभी अपने स्तर पर निश्चित ही करें । यहां उदाहरण के रूप में कुछ कृतियां दे रहे हैं –
- घर में यदि हम प्रतिदिन विभिन्न पदार्थ बनाते हैं, तो कुछ समय के लिए भोजन में क्या हम दो ही पदार्थ बना सकते हैं, उदा. रोटी-सब्जी अथवा दाल-चावल तथा सायंकाल में खिचडी अथवा पराठें ! इससे घरेलू गैस की कुछ मात्रा में बचत होगी ।
- हम जहां रहते हैं, उस मंजिल तक (लगभग चौथी मंजिल तक तो) जाने के लिए उद्वाहन का (लिफ्ट का) उपयोग न कर सीढियों का उपयोग किया जा सकता है । इससे देश की बिजली बचेगी ।
- पास में कहीं जाने के लिए वाहन का उपयोग न कर हम पैदल जा सकते हैं अथवा साइकिल का उपयोग कर सकते हैं । इससे ईंधन की बचत होगी ।
- चल-दूरभाष (मोबाइल) का उपयोग जब अति आवश्यक हो, तभी करें, तो उससे हमारा समय तथा अन्य ऊर्जा की भी बचत होगी ।
- वर्तमान में ग्रीष्म ऋतु होने से स्नान के लिए अधिक गरम पानी की आवश्यकता नहीं होती, वहां भी हम बिजली अथवा गैस की थोडी-सी बचत कर सकते हैं । इस प्रकार हम घर में माचिस, बिजली, पानी जैसे संसाधनों का मितव्ययिता से उपयोग कर सकते हैं ।
- शरीर के लिए हानिकारक ठंडे पेय पीना हम स्थायी रूप से बंद कर सकते हैं ।
ऐसी अन्य कुछ बातों का भी अध्ययन कर हम क्या बंद कर सकते हैं अथवा मितव्ययिता से उपयोग कर सकते हैं, इसका अध्ययन अवश्य करें ।
– श्री. योगेश जलतारे, संपादक, ‘सनातन प्रभात’ प्रसारमाध्यम समूह
३. ऊर्जा बचत के लाभ के गणित का अध्ययन करने पर उसकी फलोत्पत्ति ध्यान में आएगी !
‘बूंद-बूंद से सागर बनता’, यह कहावत आपने बचपन से सुनी होगी । उसके अनुसार हमने प्रतिदिन थोडी-थोडी बचत की, तो उससे अच्छा संग्रह बनता है, यह सीखने को मिलता है । इस दृष्टि से तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री द्वारा जनता से एक बार उपवास रखने के आवाहन का ही हम उदाहरण देखेंगे । सप्ताह में यदि हमने एक बार भोजन नहीं किया, तो हमें शारीरिक दृष्टि से तथा अन्न की बचत के माध्यम से, देश को लाभ होगा । मान लीजिए कि किसी व्यक्ति का आहार एक समय के भोजन में २ रोटियां खाने का है तथा भारत के ऐसे राष्ट्रभक्त नागरिकों की संख्या लगभग ५० लाख मानकर हमने एक बार भोजन नहीं किया, तो उससे एक ही समय १ करोड रोटियों की बचत होगी । पाठक समझदार हैं, इसलिए अन्य पदार्थ, उदा. चावल, सब्जी, दाल आदि के बचत का अनुपात यहां नहीं दे रहे हैं । स्वास्थ्य की दृष्टि से सप्ताह में एक बार उपवास करना चाहिए, यह आयुर्वेद ही बताता है । अतः इस उपवास से हम पर कोई दुष्परिणाम नहीं होगा, यह निश्चित है । इसके साथ ही उपवास करने से संयम भी बढेगा, यह एक अतिरिक्त उपलब्धि होगी ।
२७ मार्च २०२६ को ‘गोवा पेट्रोल डिलर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष नरहर ठाकुर ने गोवा में उपलब्ध पेट्रोल भंडार के विषय में जानकारी देते हुए कहा, ‘मेरे पेट्रोलपंप पर २६ मार्च २०२६ को ६ सहस्र लीटर पेट्रोल शेष था, जो अगले २ घंटे में समाप्त हुआ; परंतु उसके तुरंत पश्चात पेट्रोल की पुनः आपूर्ति हुई ।’ आप कल्पना कीजिए कि गोवा जैसे एक छोटे से राज्य में एक पेट्रोलपंप पर केवल २ घंटे में इतना पेट्रोल बिकता है, तो पूरे राज्य में तथा पूरे भारत देश में कितना पेट्रोल बिकता होगा ? उपरोल्लिखित देश के ५० लाख राष्ट्रप्रेमी नागरिकों ने एक सप्ताह में यदि केवल १ लीटर पेट्रोल की बचत करना सुनिश्चित किया, तो देश में प्रति सप्ताह ५० लाख लीटर पेट्रोल का उपयोग अन्य कहीं किया जा सकेगा न ? अतः जब हम छोटी-सी भी बचत करते हैं, तो उसकी उपलब्धियां बडी होती हैं, इस बात को ध्यान में रखकर हमें सर्वत्र ऊर्जा की यथासंभव बचत करनी होगी ।
– श्री. योगेश जलतारे, संपादक, ‘सनातन प्रभात’ प्रसारमाध्यम समूह (२८.३.२०२६)



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