NITI Aayog Report : शिक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की तीव्र वृद्धि के कारण गुणवत्ता पर प्रभाव !

  • नीति आयोग का प्रतिवेदन

  • सरकारी विद्यालयों में छात्रों की संख्या में अत्यंत गिरावट

नई दिल्ली – किसी भी देश की अर्थव्यवस्था एवं उसका भविष्य शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक ढांचे पर निर्भर करता है । वर्तमान में भारत की विद्यालयीन शिक्षा प्रणाली में बडा संरचनात्मक बदलाव दिखाई दे रहा है । नीति आयोग के अभी अभी प्रकाशित प्रतिवेदनके अनुसार, गत २ दशकों में भारतीय अभिभावकों का झुकाव सरकारी विद्यालयों के स्थान पर निजी विद्यालयोंकी ओर तीव्रता से बढा है; यद्यपि, प्रतिवेदन में कहा गया है कि शिक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की इस तीव्र वृद्धि ने गुणवत्ता, समानता एवं विनियमन के संबंध में कई गंभीर प्रश्न खडे कर दिए हैं ।

नीति आयोग के प्रतिवेदन के आंकडों के अनुसार, गत २ दशकों में सरकारी विद्यालयोंमें प्रवेश में बडी गिरावट आई है । वर्ष २००५ में जहां ७१ प्रतिशत छात्र सरकारी विद्यालयों में पढ रहे थे, वहीं वर्ष २०२४-२५ में यह आंकडा गिरकर केवल ४९.२४ प्रतिशत रह गया है । इसके विपरीत, अब माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर ४४.०१ प्रतिशत संस्थान निजी विद्यालयों के रूप में कार्य कर रहे हैं ।

सरकारी विद्यालयों की तुलना में निजी विद्यालयों को चुनने का कारण

यह बदलाव मुख्य रूप से एक विचारधारा से प्रेरित है । अभिभावकों का मानना है कि निजी विद्यालयों में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से अच्छी शिक्षा, कडे अनुशासन एवं भविष्य में आजीविका के उत्तम अवसर प्राप्त होते हैं । इसी कारण वे निजी संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं ।

निजी विद्यालयों में शिक्षा एवं सुविधाओं का स्तर निम्न !

प्रतिवेदन चेतावनी देता है कि अभिभावकों की अपेक्षायें सदा मूल वास्तविकता से साम्य नहीं रखतीं हैं । न्यून शुल्क वाले निजी विद्यालयोंमें स्थिति चिंताजनक है, जहां ५वीं कक्षा के ३५ प्रतिशत छात्र दूसरी कक्षा की किताब भी नहीं पढ़ सकते, जबकि ६० प्रतिशत छात्र भाग के सामान्य गणित हल नहीं कर सकते । इसके अलावा, ऐसे कई विद्यालय ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून के प्राथमिक मानकों को पूरा नहीं करते हैं एवं वहां शौचालय, खेल का मैदान एवं स्वच्छ पेय जल जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है । इन विद्यालयोंमें शिक्षकों की नियुक्ति प्राय: अनौपचारिक होती है एवं उन्हें न्यूनवेतन व बिना किसी नौकरी की सुरक्षा के कार्यरत रहना पड़ता है, जिसका सीधा प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है ।

विद्यालयोंमें शिक्षकों की कमी

देशभर के लगभग १४ लाख विद्यालयोंमें लगभग १ करोड १ लाख शिक्षक कार्यरत हैं । छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार होने पर भी, ग्रामीण एवं पिछडे क्षेत्रों में शिक्षकों की अत्यंत कमी है एवं उनके नौकरी छोडने की परिमाण अत्यधिक है । प्रतिवेदन सबसे बड़ी चिंता ‘एक-शिक्षक विद्यालय’ को मानता है । वर्तमान में १ लाख से अधिक विद्यालय (कुल विद्यालयोंके ७ प्रतिशत से अधिक) केवल एक शिक्षक के आधार पर चल रहे हैं, जिससे छात्रों को सीखने के सार्थक अवसर नहीं प्राप्त होते। साथ ही, शिक्षकों की अयोग्यनियुक्ति, कठिन कार्य परिस्थितियां, प्रशासनिक दबाव एवं विषय का अपर्याप्त ज्ञान जैसी कई चुनौतियां उपस्थितहैं ।

शिक्षा को भविष्य के अनुकूल बनाने का प्रयास

तकनीकी कौशल को बढावा देने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने अक्टूबर २०२५ में घोषणा की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० के अंतर्गत कक्षा ३ से ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)’ एवं ‘कंप्यूटेशनल थिंकिंग’ को एक अनिवार्य कौशल के रूप में पढाया जाएगा । सी.बी.एस.ई. (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल) एवं एन.सी.ई.आर.टी. (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवंप्रशिक्षण परिषद) इसका पाठ्यक्रम विकसित करेंगे । यद्यपि प्रतिवेदन यह स्वीकार करता है कि प्राथमिक ढांचे की कमी एवं शिक्षकों के पूर्णरूप से तैयार न होने के कारण इन नए विषयों को प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी चुनौती हो सकती है । शिक्षा क्षेत्र में यह बदलाव अभिभावकों की उत्तम शिक्षा की आकांक्षाओं का परिणाम है; किन्तु केवल निजी विद्यालयोंकी संख्या बढाना ही सफलता की निश्चिति नहीं है । विशेषज्ञों का कहना है कि नीति निर्माताओं को विनियमन, शिक्षकों के प्रशिक्षण एवं प्राथमिक ढांचे में न्यूनताओऺ पर तत्काल ध्यान देना होगा जिससे देश के प्रत्येक छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त होसके ।