बलोपासना करते समय संतसान्निध्य, सुसंस्कार, निरंतरता एवं ईश्वरीय कृपा होना आवश्यक !
बलोपासना अर्थात स्वरक्षा एवं शारीरिक सुदृढता, स्वस्थ एवं अच्छा शरीर, यह भले ही सत्य है, तब भी अपनी शक्ति एवं बल का उपयोग किसके सामने, कितनी मात्रा में तथा कैसे करना है, इसका बोध होना भी आवश्यक है । क्या अच्छा तथा क्या बुरा, यह जानने की बुद्धि होनी चाहिए । उसे नीर-क्षीर विवेकबुद्धि कहते हैं । हंस एवं बगुला, ये दो पक्षी श्वेत रंग के ही होते हैं; परंतु पानी एवं दूध को मिलाकर उनके सामने रखा जाए, तो केवल हंस ही उस मिश्रण में से दूध ही पीता है । यही होती है नीर-क्षीर विवेकबुद्धि ! अर्थात वह प्राप्त होने के लिए संतसान्निध्य, सुसंस्कार, निरंतरता एवं ईश्वरीय कृपा होना आवश्यक है । कहा जाता है कि ‘सशक्त शरीर में सशक्त मन वास करता है ।’ उसकी सीख देने के लिए ही समर्थ रामदासस्वामीजी ने ११ हनुमानजी की स्थापना की ।
‘एक्जर्शन’ (परिश्रम करना) एवं ‘एक्सरसासाइज’ (व्यायाम), इन दो कृतियों का अर्थ शरीर को होनेवाला श्रम ही है; परंतु उसमें एक मूलभूत अंतर है । केवल जीविका के लिए किया जानेवाला श्रम परिश्रम है, जैसे थकना-भागना ! वह व्यायाम नहीं है; क्योंकि वहां शारीरिक गतिविधियां मनुष्य विवश होकर करता है । मन में विशिष्ट उद्देश्य अथवा उत्तम विचार रखकर उसके द्वारा शरीर को अत्यंत शास्त्रशुद्ध एवं भक्तिपूर्वक उत्तम मार्गदर्शन के माध्यम से किया गया परिश्रम व्यायाम है ! शरीर बनाना एवं शरीर को प्रतिकारक्षम बनाना ही वास्तव में बलसंवर्धन है ।
समर्थ रामदासस्वामीजी के समय की स्थिति तथा स्वतंत्रता के उपरांत वर्तमान समाज की स्थिति
रामदासस्वामीजी ने ४०० वर्ष पूर्व बलोपासना का मंत्र दिया । उस समय भारत परतंत्र था । आज २१वीं शताब्दी में हम भले ही स्वतंत्र हैं, तब भी मानसिक एवं शारीरिक स्थिति तब की तुलना में बहुत भिन्न नहीं है । समाज उतना विवेकशील, बलवान एवं सशक्त नहीं है । वर्तमान में समाज में चल रहे हिंसक, घृणित एवं विकृत कृत्यों को देखा जाए, तो रामदासस्वामीजी द्वारा दिया गया विवेकशील बलोपासना का मंत्र कितना त्रिकालदर्शी था, इसकी सच्चाई ध्यान में आती है । दुर्भाग्यवश वर्तमान गतिशील जीवनपद्धति, प्राणघातक महत्त्वाकांक्षाएं, स्वार्थ, शीर्ष स्तर की स्पर्धा, गुणवत्ताहीन आहार, अधूरी नींद, व्यायाम का अभाव, शरीर की उचित गतिविधियों का अभाव, शीघ्र जीवनपद्धति के अनुसार रोग होने के उपरांत अथवा उससे पूर्व ही उस रोग के विशेषज्ञों के लगाए जानेवाले चक्कर, शरीर पर अनचाहे औषधियों की तथा उपचारों की मार तथा इस पद्धति से आचरण करने से सुदृढ शरीर की धीमी पड रही प्रगति आदि के कारण सुदृढ एवं स्वस्थ शरीर पर दुष्परिणाम होते हैं । उससे स्वाभाविक ही रोगप्रतिरोधक क्षमता क्षीण होकर रोगों में वृद्धि होती है ।
रामनवमी के उपलक्ष्य में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्य किए जाते हैं । आरतियां एवं भजन चलाए जाते हैं । मन को सुंसस्कारित करने के लिए वे आवश्यक हैं ही; परंतु उसके साथ ही रामदासस्वामीजी द्वारा दिया गया बलोपासना का मंत्र, मनोपासना के विचार एवं कृति राष्ट्रप्रवर्तक ही सिद्ध होंगे !
– रामकृष्ण विनायक अभ्यंकर, बोरिवली (प.), मुंबई, महाराष्ट्र.
(साभार : साप्ताहिक कोकण मीडिया)
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मैं रामनाथी (गोवा) के सनातन आश्रम में स्थित ‘सेतुरक्षक हनुमान मंदिर’ के पास बैठकर जप कर रहा था । मेरे मन में विचार आया, ‘प्रभु श्रीराम ने वानरसेना से रामसेतु का निर्माण करवाकर उनकी आध्यात्मिक प्रगति (साधना) करवा ली । सनातन के आश्रमों में साधक विभिन्न सेवाएं करते हैं । ये सेवाएं तो एक प्रकार से ‘रामसेतु’ की सेवा की भांति ही हैं । सनातन के आश्रम में सेवा करनेवाले साधकों को गुरुदेवजी बहुत अनुभूतियां एवं आनंद देते हैं, साथ ही यह भी सिखाते हैं कि ‘स्वभावदोष कैसे नष्ट करने चाहिए ?’ रामसेतु के निर्माणकार्य में सहभागी वानरों को मोक्षप्राप्ति हुई, साथ ही सनातन के आश्रम में स्थित यह सेवारूपी ‘रामसेतु’ इसमें सहभागी साधकों को मोक्ष तक लेकर ही जाएगा !’ – श्री. सूरज हरवाळकर (आयु २८ वर्ष), रामनगर, तहसील खानापुर, जिला बेळगांव, कर्नाटक. (२८.११.२०२४) |

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
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