सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुईया का वक्तव्य

बेंगलुरु (कर्नाटक) – न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा ‘राजा से भी अधिक निष्ठावान’ होने की मानसिकता से ग्रस्त हो गया है । अर्थात कुछ लोग शासन से भी अधिक निष्ठावान बनने की प्रवृत्ति अपना रहे हैं । इसी कारण लोग महीनों-महीनों तक जेल में पडे रहते हैं । कुछ घटनाओं में व्यवस्था इतनी कठोर हो जाती है कि आवश्यकता से अधिक घटनाएं लिखी जाती हैं । ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ रोकथाम कानून एक बडा साधन है, परंतु इसका आवश्यकता से अधिक उपयोग इसकी प्रभावशीलता को निर्बल करता है ।
‘यू.ए.पी.ए.’ कानून (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट – गैरकानूनी गतिविधि निवारण कानून) के अंतर्गत जब दोष सिद्धि की दर लगभग ५ प्रतिशत से भी कम है, तो आरोपियों को वर्षों तक जेल में क्यों रखा जाए ? ऐसा प्रश्न न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुईया ने यहां सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन की पहली राष्ट्रीय परिषद में बोलते हुए उठाया ।
सामाजिक माध्यमों की पोस्ट से न्यायालय के समय का दुरुपयोग
न्यायमूर्ति भुईया ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट से जुडे कुछ विवादों को संभालने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विशेष जांच दल (SIT) गठित करना पडा, जिससे केवल समय की बर्बादी हुई । ‘विकसित भारत’ एक राजनीतिक उद्देश्य है तथा न्यायालयों को अपने कार्य में स्वतंत्र रहना चाहिए । जब हम विकसित भारत की बात करते हैं, तब विचार-विमर्श एवं मतभेद के लिए स्थान होना आवश्यक है । मतभेदों को अपराध नहीं माना जाना चाहिए ।
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