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श्री. प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, दैनिक ‘सनातन प्रभात’

मुंबई, २५ फरवरी (संवाददाता) : विभिन्न समाजघटकों के कल्याण के लिए सरकार ने विभिन्न निगम, प्राधिकरण आदि का गठन किया है । ये सरकारी संस्थाएं सरकार को आर्थिक लाभ दिलाने के लिए नहीं, अपितु समाजहित के लिए सेवा के उद्देश्य से चलाई जाती हैं; परंतु ‘सेवार्थ’ के नाम पर इन संस्थाओं की आर्थिक अनुशासनहीनता चलने दी जा रही है । १४ दिसंबर २०२५ तक राज्य के महामंडल, मंडल, प्राधिकरण, आयोग एवं विश्वविद्यालयों के ७६८ वार्षिक ब्योरे लंबित हैं । इनमें वार्षिक लेखापरीक्षण एवं कार्य ब्योरों का समावेश है । इसमें १-२ वर्ष के ब्योरे लंबित रहने को समझ लिया जा सकता है; इनमें से कुछ संस्थाओं के ब्योरे विगत १४ वर्षाें से लंबित होने की विदारक स्थिति है । कुल मिलाकर यह अनियमितताएं प्रशासनिक अनुशासन को साख पर बिठानेवाली तो है ही; परंतु साथ ही विधानमंडल के लिए भी अवमानकारक है । ‘सनातन प्रभात’ के विशेष प्रतिनिधि श्री. प्रीतम नाचणकर को विधानमंडल से सूचना के अधिकार के अंतर्गत यह जानकारी उपलब्ध हुई है । सरकार को इसकी ओर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है ।
सरकारी एवं गैरसरकारी एवं अर्धसरकारी निगमों को प्रतिवर्ष सरकार को उनके हिसाब प्रस्तुत करना आवश्यक है । आर्थिक अनुशासन बने रहने के लिए तथा अनियमितता टालने के लिए इन संस्थाओं के लिए प्रतिवर्ष विधानमंडल में वार्षिक ब्योरे प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है; परंतु वार्षिक ब्योरे प्रस्तुत करने के लिए विधानमंडल सचिवालय से बार-बार पत्राचार कर भी ये संस्थाएं उसकी ओर ध्यान नहीं देती । ३ से १४ वर्षाें तक ब्योरे प्रस्तुत न करने वाली संस्थाओं की संख्या १२५ है, जिनमें विश्वविद्यालयों का भी समावेश है ।
विलंब के कारणों की केवल औपचारिकता !

लंबित ब्योरा विधानमंडल में प्रस्तुत करते समय विलंब के कारण देने का भी नियम है; परंतु वास्तव में विलंब के कारण देने की केवल औपचारिकता निभाई जाती है । इनमें से अधिकतर संस्थाएं विलंब के कारण देने के स्थान पर प्रक्रिया का घटनाक्रम देते हैं; परंतु विलंब के ठोस कारण, त्रुटियां तथा उनके उपाय प्रस्तुत नहीं करते । इसलिए विलंब के कारण देना केवल औपचारिकता बन गई है ।
इस विषय में विधानमंडल सचिवालय के संबंधित विभाग के एक अधिकारी ने निगमों का लेखापरीक्षण करने के लिए ‘सरकारी परीक्षक’ उपलब्ध नहीं होते, ऐसा बताया । (इससे अधिक क्षोभजनक बात और क्या हो सकती है ? सरकारी संस्थाओं को हिसाब करने के लिए कोई नहीं मिलता; इसलिए क्या १४ वर्षाें तक ब्योरे ही प्रस्तुत नहीं किए ? ऐसा स्पष्टीकरण देनेवाले सरकारी संस्थाओं के अधिकारियों को अब चूडियां पहनाकर घर पर ही बिठाना चाहिए ! – संपादक)
कुल मिलाकर प्रशासनिक एवं विधानमंडल के कामकाज की दृष्टि से यह घटना अत्यंत गंभीर है । इस विषय में वास्तव में सदस्यों को ही सदन में आवाज उठाना अपेक्षित है; परंतु वैसे नहीं होता । इस कारण ‘सेवार्थ’के नाम पर शासनकृत महामंडल, मंडल एवं प्राधिकरणों की लापरवाही बढ रही है ।
संपादकीय भूमिका
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