
पहले हमारे बच्चों को वे शिक्षित, विवेकशील एवं संस्कारक्षम नागरिक बनें तथा वे जीवन के लिए आवश्यक उतना ही अर्थार्जन करें; इसके लिए शिक्षा दी जाती थी । वर्तमान में शिक्षा का भी विकृतीकरण हुआ है । अभिभावकों की मानसिकता, उद्देश्य एवं ध्येय, भयावह स्पर्धात्मक एवं सबकुछ प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए ऐसा हुआ है । उसके लिए अभिभावक आवश्यकता से अधिक तथा अपनी क्षमता से अधिक खर्चा करते हैं । परीक्षा में हमारे लडके अथवा लडकी को अच्छे अंक मिले, तो हमें समाज में प्रतिष्ठा मिलेगी तथा प्रशंसा होगी, ऐसी भी कुछ लोगों की मानसिकता होती है ।
इसके परिणामस्वरूप आज के बच्चे अभिभावकों की इस अपेक्षा के बोझ में जीवन जी रहे हैं । वे इस तनाव में रहते हैं कि ‘क्या हम इस प्रतियोगिता में टिके रह पाएंगे ?’ अभिभावकों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं, तो अभिभावक क्या कहेंगे ? तथा हम इस स्पर्धा में टिक नहीं पाए, तो समाज क्या कहेगा ?, इन दोहरे विचारों के घेरे में आज के बच्चे फंसे होते हैं । वर्तमान में खेलने की आयु में बच्चे तथा उचित संस्कार देने के समय में अभिभावक, ये दोनों भी इस दुष्टचक्र में फंसे दिखाई देते हैं ।

अधिक अंक प्राप्त करने की अपेक्षा के कारण बच्चे अभिभावकों से दूर गए हैं अथवा उन्हें निराशा आई है, ऐसा कुछ वर्ष पूर्व हम सुनते थे; परंतु अब बच्चों की यह निराशा प्रतिक्रियाओं के माध्यम से व्यक्त होने लगी है । इसके परिणामस्वरूप अभिभावक भी उनके प्रति कडी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं । महाराष्ट्र के सांगली में हुई ऐसी एक घटना इसका उदाहरण है । चिकित्सकीय प्रवेश परीक्षा की तैयारी की परीक्षा में अच्छे अंक न मिलने से पिता द्वारा क्षोभ व्यक्त किए जाने पर पिता को उल्टा उत्तर देने से पिता ने क्रोधित होकर लडकी को पीटा, जिसमें लडकी की मृत्यु हो गई । इस लडकी के पिता स्वयं प्रधानाध्यापक थे । ‘मेरी लडकी को अच्छे अंक मिलने ही चाहिए’, यह उनका दुराग्रह उन्हें किस स्तर तक ले गया ? पिता की इस अनुचित कृति से उनकी भीषण मानसिकता सामने आई । उसके कारण ‘ऐसे प्रधानाध्यापक विद्यालय कैसे चलाते होंगे’ य- ह प्रश्न उत्पन्न हो गया । वर्तमान में अभिभावकों को लगता है कि उनके बच्चे एक तो डॉक्टर अथवा अभियंता (इंजीनियर) बनकर बहुत धन कमाएं । कदाचित वे अपने सपनों को उनके बच्चों के माध्यम से पूरा करवा ले रहे हैं । उक्त घटना के उपरांत समाज में ऐसी प्रतिक्रियांएं आने लगीं कि ‘हमें बच्चों को स्वतंत्रता देनी चाहिए’, ‘हमें बच्चों को इस प्रकार स्पर्धात्मक युग में ढकेलना नहीं चाहिए ।’ अभिभावकों को अपने बच्चों पर उनकी अपेक्षाएं थोपने से पूर्व अंतर्मुख होकर विचार करना चाहिए।
– श्रीमती गौरी आफळे, फोंडा, गोवा.
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