सुसंस्कार

बच्चे का मन निर्दाेष, कोमल एवं किसी कोरी स्लेट (तख्ती) की भांति होता है । बचपन में ही हम उस पर जो संस्कार करेंगे, उनके स्थायी रहने की संभावना होती है । अभिभावक अपने बच्चे में अच्छी आदतें विकसित करें, उनके सामने अच्छे आदर्श स्थापित करें; साथ ही माता-पिता बच्चे को अच्छा व्यवहार एवं सत्य के मार्ग पर चलने की शिक्षा दें । बचपन में किए गए संस्कारों से बच्चों का जीवन आदर्श बनता है । इस लेख में दी गई जानकारी के आधार पर अभिभावकों द्वारा छोटी आयु में ही बालक के मन को सुसंस्कारित किया जाए तथा सुसंस्कार की खाद से उगनेवाला वह बालकरूपी पौधा गुणवान, बुद्धिमान एवं आदर्श बने, ईश्वर के चरणों में यही प्रार्थना है !

एआय निर्मित चित्र

संस्कार क्या होते हैं ?

संस्कार का अर्थ है गुणों का गुणा एवं अवगुणों का भाग ! विचार एवं कृतियां अच्छी हों, इसके लिए संस्कार की आवश्यकता होती है । भारतीय शास्त्र के अनुसार प्रत्येक कृति संस्कारयुक्त होनी चाहिए तथा प्रत्येक कार्य भी अच्छा एवं संस्कारयुक्त होना चाहिए, उदा. हम केला खाकर उसका छिलका फेंक देते हैं, यह कृति है; परंतु केला खाकर छिलके को कूडेदान में डालना प्रकृति (स्वभाव) तथा केला खाकर छिलका सडक पर फेंकना विकृति है । अन्यों के द्वारा सडक पर फेंके गए छिलके को कूडेदान में डालना संस्कृति है ।

सुसंस्कारों का महत्त्व !

सुसंस्कारित मन जीव को कहीं भटकने ही नहीं देता । इसीलिए बच्चों का मन सुसंस्कारित करना हिन्दू पद्धति से धर्माचरण करनेवाले लोगों का तथा समाज का कर्तव्य है ।

छत्रपति शिवाजी महाराजजी ने हिन्दवी स्वराज्य की अर्थात आदर्श हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की । उसके लिए जीजामाता ने उन्हें बचपन में ही संस्कारों की घुट्टी पिलाई, उनमें प्रखर धर्माभिमान एवं राष्ट्राभिमान जागृत किया । महाराज को शस्त्रों का प्रशिक्षण देकर उनमें क्षात्रवृत्ति जागृत कर उनके मन में अन्याय एवं अत्याचार के प्रति चिढ निर्माण की । जीजामाता ने महाराज के बचपन में ही उनमें भक्ति एवं हिन्दू धर्म के संस्कारों का बीज बोकर वास्तव में छत्रपति शिवाजी महाराजजी को तैयार किया । इसी के बल पर हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना हो पाई तथा उसके फलस्वरूप आज हम ‘हिन्दू’ के रूप में जीवन व्यतीत कर पा रहे हैं ।