
नई दिल्ली – सर्वोच्च न्यायालय ने संसद के मध्यवर्ती सभागार तथा सार्वजनिक स्थानों से वीर सावरकर का तैलचित्र हटाने की मांग करनेवाली जनहित याचिका को निरस्त कर दिया है । यह याचिका सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी बी. बालमुरुगन द्वारा प्रस्तुत की गई थी । इस अवसर पर न्यायालय ने बालमुरुगन को सचेत करते हुए कहा कि ‘न्यायालय के समय का अपव्यय करने के कारण आप पर भारी अर्थदंड (जुर्माना) भी लगाया जा सकता है ।’ इस याचिका में यह मांग भी की गई थी कि ‘गंभीर अपराधों अथवा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोपित व्यक्तियों का सम्मान सरकार तब तक न करे, जब तक वे निर्दोष सिद्ध न हो जाएं ।’
१.जब बालमुरुगन ने यह तर्क दिया कि ‘आर्थिक कठिनाइयों के कारण मैं तर्क-वितर्क (बहस) हेतु दिल्ली नहीं आ सकता’, तब न्यायालय ने उन्हें फटकारते हुए कहा कि ‘आप एक प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं, आप दिल्ली आकर अपना पक्ष रख सकते हैं । हम आप पर भारी अर्थदंड लगा सकते हैं । आप स्वयं को क्या समझते हैं ?’
२. न्यायालय ने बालमुरुगन से कहा, ‘कृपया ऐसे विवादों में न पडें । अपनी निवृत्ति का आनंद लें और समाज में रचनात्मक भूमिका का निर्वहन करें ।’ इसके पश्चात बालमुरुगन ने अपनी याचिका वापस ले ली । (१५.१.२०२६)
संपादकीय भूमिकाऐसी याचिका करनेवालों को ‘काला पानी’ का ही दंड मिलना चाहिए ! |
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