भारत बना रहा है संस्कृत भाषा में ‘चैट जीपीटी’ समान एआई तकनीक ! – Sanskrit AI MDS College Chennai

  • ११९ वर्षों से कार्यरत तमिलनाडु के एम.डी.एस. संस्कृत महाविद्यालय ने की पहल

  • १ लाख १० सहस्र संस्कृत पुस्तकों का होगा अंतर्भाव

  • ‘संस्कृत लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ करेंगे विकसित

(एआई का अर्थ है कृत्रिम बुद्धिमत्ता)

चेन्नई (तमिलनाडु) – भारत की गौरवशाली विरासत एवं आधुनिक तकनीक का एक स्वर्णिम संगम शीघ्र ही देखने को मिलेगा । चेन्नई के समीप स्थित ११९ वर्षों से कार्यरत मैलापुर के ‘एम.डी.एस. संस्कृत महाविद्यालय’ के नेतृत्व में भारत अब स्वदेशी ‘संस्कृत लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ विकसित कर रहा है । अतिमहत्त्वाकांक्षी अथवा धर्मप्रेम से ओतप्रोत इस परियोजना के अन्तर्गत लगभग १ लाख १० सहस्र से अधिक संस्कृत ग्रंथों का अन्तर्भाव किया गया है । इसमें दुर्लभ हस्तलिखित एवं शास्त्र सम्मिलित हैं । ‘कुप्पुस्वामी शास्त्री अनुसंधान संस्थान’ के साहित्य को भी इसमें सम्मिलित किया गया है । यह परियोजना केवल अनुवाद तक सीमित न रहकर संस्कृत व्याकरण, तर्कशास्त्र एवं संरचना पर आधारित एक पूर्णतः स्वदेशी ‘एआई मॉडल’ बननेवाला है । इससे संस्कृत ग्रंथों के अचूक सन्दर्भ एवं उनका अर्थ मिल सकेगा ।

लार्ज लैंग्वेज मॉडल क्या है ?

लार्ज लैंग्वेज मॉडल एक प्रकार की कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली है, जो अन्य कार्यों के साथ लेखन को पहचान सकती है अथवा बना भी सकती है । इस प्रणाली को विशाल पाठ (डेटा) द्वारा तैयार किया जाता है । इसलिए इसे ‘लार्ज’ संज्ञा दी गई है । इस संगणकीय प्रणाली को बनाते समय शब्दों के क्रम सम्भालने हेतु भी उसे प्रशिक्षित किया जाता है । सरल भाषा में कहें, तो ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ एक संगणकीय प्रणाली है, जिसमें मानवीय भाषा अथवा अन्य प्रकार के जटिल पाठ की पहचान एवं अर्थ लगाने हेतु पर्याप्त उदाहरण दिए जाते हैं ।

परियोजना की विशेषताएं !

१. अचूकता एवं गति : महाविद्यालय द्वारा स्वयं बनाई गई विशेष प्रणाली (सॉफ्टवेयर) की सहायता से ‘स्कैन’ की गई संस्कृत हस्तलिपियां ९७ प्रतिशत अचूकता के साथ डिजिटल स्वरूप में संरक्षित की जा रही हैं । विशेष यह कि एक प्रायोगिक परीक्षण में केवल २४ घण्टे में १ सहस्र से अधिक संस्कृत पुस्तकों का ‘डिजिटलीकरण’ किया गया । उसमें केवल ३ – ४ प्रतिशत ही त्रुटियां रहीं ।
२. विद्वानों का योगदान : केवल तकनीक पर निर्भर न रहकर प्रत्येक लेखन का सत्यापन संस्कृत विद्वानों द्वारा किया जा रहा है, जिससे सूचना की गुणवत्ता उच्च स्तर की बनी रहे ।
३. तकनीकी चुनौतियां : संस्कृत की ‘संधि’, शब्दरचना एवं क्लिष्ट व्याकरण को ध्यान में रखकर यह तकनीक बनाना एक बडी चुनौती है । इसके लिए आईआईटी मद्रास, साथ ही ‘नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी’ जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं का सहयोग लिया जा रहा है । (१.१.२०२६)

इस तकनीक का यह है महत्त्व !

एआई

यह परियोजना ३ वर्षों की है एवं आगामी २ वर्षों में ही इसका उपयोग सामान्यजन कर सकेंगे, ऐसा बताया जा रहा है । इस उपक्रम से भारत का प्राचीन ज्ञान केवल संग्रहालय तक सीमित नहीं रहेगा, वरन संगणकीय भाषा में पूरे विश्व तक पहुंचने में सहायता होगी । ‘यह परियोजना केवल तकनीक नहीं, अपितु हमारी सांस्कृतिक विरासत ‘एआई’ के माध्यम से भविष्य की पीढियों को सौंपने का एक प्रयास है’, ऐसा महत्त्वपूर्ण मत विशेषज्ञों ने व्यक्त किया है ।

संपादकीय भूमिका

एम.डी.एस. संस्कृत महाविद्यालय का जितना अभिनन्दन करें उतना कम है ! वर्तमान में भारतभर में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लहर चल रही है । ऐसे में इस प्रकार की भव्य परियोजनाओं को हाथ में लेना अत्यंत आवश्यक है । साथ ही, ऐसी परियोजनाओं से भारत एवं हिन्दू विरोधी कथानकों (सामग्री) के वैचारिक जाल में फंसा हुआ मानव, हिन्दू धर्म की विरासत को अपनाकर अपना जीवन सार्थक करने हेतु आगे बढेगा, यह निश्चित है  !