Gujrat HC On WAQF : वक्फ बोर्ड अब न्यायालयीन शुल्क का भुगतान किए बिना अभियोग प्रविष्ट नहीं कर सकेगा !

  • गुजरात उच्च न्यायालय का वक्फ बोर्ड के विषय में ऐतिहासिक निर्णय !

  • न्यायालय ने इससे संबंधित १५० याचिकाएं खारीज की !

कर्णावती (गुजरात) – गुजरात उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड के सदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक निर्णय दिया है । न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि वक्फ बोर्ड अब न्यायालयीन शुल्क का भुगतान किए बिना अभियोग प्रविष्ट नहीं कर सकेगा । लगभग एक हप्ते तक चली सुनवाई के उपरांत उच्च न्यायालय ने वक्फ संस्थाओं के द्वारा प्रविष्ट की गई लगभग १५० याचिकाएं खारीज की हैं । इन याचिकाओं में किराएदारों अथवा कथित अतिक्रमणकर्ताओं से वक्फ की संपत्ति पर पुनः नियंत्रण स्थापित करना, साथ ही उससे संबंधित लाभ प्रदान करने की मांग की गई थी । इस निर्णय को गुजरात के इतिहास के वक्फ प्रकरणों में से सबसे बडी संख्या में सामूहिक याचिकाओं को खारीज करने में से एक माना जा रहा है । इस संदर्भ में जनता की यह धारणा बन चुकी थी कि एक ओर न्यायालय एवं न्यायाधिकरण में अपील करते समय वक्फ संस्थाओं को विशेष छूट दी जाती है, तो दूसरी ओर मंदिरों एवं अन्य धार्मिक संस्थाओं को न्यायालयीन शुल्क का भुगतान करना पडता है ।’ इस निर्णय से इस धारणा पर पूर्णविराम लगा है ।

१. याचिकाकताओं में ‘सुन्नी मुस्लिम ईदगाह मशीद ट्रस्ट वडोदरा’, ‘सहर मशीद सभा ट्रस्ट’, साथ ही कर्णावती की ‘सरखेज रोजा समिति’ जैसे वक्फ न्यासियों का समावेश था । इन न्यासियों ने गुजरात राज्य वक्फ न्यायाधिकरण के आदेशों को चुनौती दी थी । उन आदेशों के अनुसार किसी भी विवाद की सुनवाई से पूर्व न्यायालयीन शुल्क का भुगतान करना आवश्यक था ।

२. उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि वक्फ न्यासियों ने न्यायाधिकरण के सामने इसप्रकार की छूट मांगी थी, जिससमें दोनों पक्षों में विवाद था तथा जिस पर निर्णय देने हेतु कानूनन अधिकार एवं दायित्व सुनिश्चित करना था । उसके कारण ये प्रकरण सामान्य आवेदन न होकर संपूर्ण विवादित अभियोग थे ।

३. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वक्फ अधिनियम के अनुच्छेद ८३ के अंतर्गत प्रविष्ट होनेवाले आवेदन न्यायिक कार्यान्वयन ही होते हैं । ऐसे आवेदन अभियोग बन जाते हैं; उसके कारण उनके संदर्भ में गुजरात न्यायालयीन शुल्क अधिनियम २००४ लागू होता है । उसके कारण न्यायालयीन शुल्क का भुगतान करना अनिवार्य है ।

वक्फ न्यायाधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप न करने का निर्णय

गुजरात उच्च न्यायालय ने बताया कि वक्फ न्यायाधिकरण द्वार दिए गए पहले आदेश में अभियोग के मूल्य में न्यायालयीन शुल्क एवं अधिकारक्षेत्र की दृष्टि से संशोधित करने के निर्देश दिए गए थे । वक्फ संस्थाओं ने निहित समय में किसी भी उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दी थी । उसके उपरांत न्यायालयीन शुल्क का भुगतान न करने उनका दावा जब खारीज किया गया, तब उस पर आपत्ति जताई गई । पहले आदेश के समय ही समय रहते चुनौती न देने के कारण अब केवल शुल्क का भुगतान न करने के कारण से दूसरे आदेश को अनुचित ठहराया नहीं जा सकता । कनिष्ठ न्यायालय के आदेश में कोई भी गंभीर कानूनी चूक, अधिकारी क्षेत्र की त्रुटि अथवा कानून की अनुचित कार्रवाई दिखाई न देने के कारण उसमें हस्तक्षेप करने का प्रश्न ही नहीं उठता । इस आधार पर ये सभी याचिकाएं खारीज की गई ।

‘आवेदन’ कहने से नियम नहीं बदलते !

वक्फ संस्थाओं की ओर से यह तर्कवाद किया गया कि वक्फ अधिनियम में न्यायालयीन शुल्क के विषय में स्पष्टतापूर्ण प्रावधान नहीं है । उसके कारण उसके अंतर्गत प्रविष्ट होनेवाले आवेदनों पर शुल्क नहीं लगाया जाना चाहिए; परंतु उच्च न्यायालय ने यह तर्क खारीज किया ।

अनेक वर्षाें की अवधारणा हुई दूर

पहले कुछ कानूनी प्रावधानों के कारण वक्फ संस्थाओं को न्यायालयीन शुल्क से छूट मिलती थी; परंतु अब यह छूट समाप्त हुई है, ऐसा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है । अब मुस्लिम वक्फ ट्रस्ट को भी अन्य धार्मिक ट्रस्ट एवं धर्मादाय संस्थाओं के भांति अभियोग लडने के लिए एक सुनिश्चित शुल्क का भुगतान करना पडेगा । विगत अनेक वर्षाें से छोटे दर्गाह व्यवस्थापन से लेकर बडे मस्जिद बोर्ड तक यह धारणा थी कि वक्फ से संबंधित विवादों पर न्यायालयीन शुल्क नहीं लगता; परंतु इस निर्णय के कारण यह अवधारणा दूर हुई है ।

देशव्यापी चर्चा की पृष्ठभूमि पर आया यह निर्णय

वर्तमान समय में पूरे देश में वक्फ प्रशासन पर चर्चा चल रही है, तो ऐसे समय में यह निर्णय दिए जाने से उसे विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ है । इस वर्ष संसद में वक्फ संशोधन अधिनियम २०२५ पारित किया गया था । वक्फ भूमियों एवं उनकी संपत्ति के व्यवस्थापन में सुधार करना इस कानून का उद्देश्य है । कुछ लोगों ने इस कानून का स्वागत किया है, जबकि कुछ लोगों ने उसकी आलोचना भी की है ।

उच्च न्यायालय का यह निर्णय ‘ऐतिहासिक’ ! – उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी

हर्ष संघवी

गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष रमेश संघवी ने गुजरात उच्च न्यायालय के इस निर्णय को ‘ऐतिहासिक निर्णय’ कहा है । उन्होंने बताया कि भारत में सभी धर्म समान हैं तथा न्यायालय ने सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित किए हैं । कांग्रेस वोटबैंक की राजनीति के कारण वक्फ कानून लेकर आई थी, उसमें वक्फ संपत्तियों एवं न्यायाधिकरण में प्रविष्ट प्रकरणों को न्यायालयीन शुल्क से छूट देने के प्रावधान थे; परंतु मंदिर, गुरुद्वारे अथवा अन्य धार्मिक संपत्तियों से संबंधित ऐसे प्रकरणों पर शुल्क लगाय जाता था । इस निर्णय के कारण अब यह असमानता दूर हुई है ।

संपादकीय भूमिका

  • अब तक वक्फ बोर्ड को इसप्रकार की छूट क्यों दी जा रही थी ?, यह बात भी सामने आनी चाहिए !
  • जनता को लगता है कि अब न्यायालय को वक्फ बोर्ड को ही निरस्त करने का आदेश देना चाहिए !