AIIMS Study : देश में १३ वर्ष की आयु से ही बच्चों में तंबाकू, धूम्रपान, मद्यपान आदि व्यसन आरंभ होते हैं !

प्रतीकात्मक चित्र

नई देहली – देहली के ‘एम्स’ चिकित्सालय के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है कि देश के विद्यालय जाने वाले बच्चों में तंबाकू, धूम्रपान, मद्यपान, तथा मादक पदार्थों का व्यसन औसत १३ वें वर्ष में ही आरंभ हो जाता है । इस अध्ययन में भारत के १० प्रमुख नगरों के विद्यालयीन विद्यार्थियों का समावेश था । कुल ५ सहस्त्र ९२० विद्यार्थियों पर सर्वेक्षण किया गया ।

१. अध्ययन के अनुसार, कक्षा ८ वीं, ९ वीं, ११ वीं तथा १२ वीं में पढने वाले विद्यार्थियों में से बड़ी संख्या में बालकों ने अल्पायु में ही व्यसनों का अनुभव किया है, ऐसा ज्ञात हुआ ।

२. बालक अल्पायु में ही अर्थात् औसत ११ वर्ष ३ माह के होने पर श्वास द्वारा ग्रहण किए जाने वाले मादक पदार्थों का सेवन करते हैं , तो औसत १२ वर्ष ३ माह के होने पर हेरॉइन का तथा औसत १२ वर्ष ५ माह के होने पर चिकित्सकीय औषधियों का दुरुपयोग करते हैं ।

३. अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ है कि बालकों द्वारा सर्वाधिक उपयोग किए जाने वाले पदार्थ तंबाकू एवं मद्यपान हैं ।

४. अध्ययन में सम्मिलित हुए विद्यार्थियों में से १५ प्रतिशत से अधिक विद्यार्थियों ने जीवन में कभी न कभी व्यसन किया है, यह स्वीकार किया , जबकि १०.३ प्रतिशत विद्यार्थियों ने विगत एक वर्ष में तथा ७.२ प्रतिशत विद्यार्थियों ने विगत माह में ऐसे पदार्थों का उपयोग करने का बताया ।

५. आधे विद्यार्थियों ने तंबाकू सहज रूप से उपलब्ध होने का , जबकि ३६ प्रतिशत विद्यार्थियों ने मद्य सहजता से प्राप्त होने का उल्लेख किया । इससे यह सामने आया है कि अल्पवयस्क बालकों को व्यसनाधीन पदार्थ सरलता से उपलब्ध हो रहे हैं ।

६. ९५ प्रतिशत विद्यार्थियों को व्यसन हानि पहुंचाने वाला है , इस बात का ज्ञान होते हुए भी वे उनका उपयोग आरंभ रखे हुए हैं, यह देखा गया ।

७. नगरीय क्षेत्रों में बालिकाओं में बडी संख्या में धूम्रपान तथा मद्यपान की लत देखी गई है ।

८. सूत्रों का कहना है कि विद्यालयीन तथा महाविद्यालयीन परिसर में केवल तंबाकूजन्य पदार्थ ही नहीं , अपितु मादक पदार्थ भी सार्वजनिक रूप से मिलते हैं । चरस-गांजे से लेकर विविध मादक पदार्थ विद्यार्थियों को सरलता से उपलब्ध हो रहे हैं तथा बडी संख्या में तरुण पीढी व्यसन की ओर मुडती हुई दिखाई दे रही है ।

९. विशेषज्ञों का कहना है कि विद्यार्थी पहले आनंद के रूप में , फिर मित्रों के आग्रह के भाग के रूप में तथा उसके उपरांत लत के भाग के रूप में—ऐसे चरणों में यह व्यसनाधीनता की यात्रा विद्यालयीन जीवन से ही आरंभ हो जाती है ।

संपादकीय भूमिका 

क्या ऐसे बालक देश के आदर्श नागरिक बन सकते हैं ? इसके लिए जनता को साधना न सिखाने वाले अभी तक के सभी दलों के शासक ही उत्तरदायी हैं !