‘यौन अपराधों से बच्चों की रक्षा’ अर्थात ‘पॉक्सो’ (POCSO) कानून के अंतर्गत वर्तमान समय में यौन संबंध बनाने के लिए प्रावधित १८ वर्ष की आयु को १६ वर्ष करने के प्रस्ताव पर सर्वोच्च न्यायालय में (रिट पिटीशन (नागरी) क्र. ५६५, वर्ष २०१२ – W.P. (Civil) No. 565 of 2012) गंभीरता से विचार चल रहा है । इस संदर्भ में केवल कानूनी ही नहीं, अपितु भारतीय धर्मशास्त्र एवं आधुनिक मानसशास्त्र के आधार पर विचार मंथन करनेवाला यह लेख है ।

१. मानसशास्त्रीय एवं वैज्ञानिक आधार (Neurobiological Immaturity)
१ अ. अविकसित मस्तिष्क एवं निर्णयक्षमता : किशोर आयु के बच्चों के मस्तिष्क में स्थित ‘प्रिफ्रंटल कॉर्टेक्स’ (Prefrontal Cortex) का विकास अधूरा होता है । मस्तिष्क का यह अंग निर्णयक्षमता, खतरे का मूल्यांकन (Risk Assessment) एवं आवेग नियंत्रण (Impulse Control) की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है । मानसशास्त्र के अनुसार यह विकास सामान्य रूप से २५ वर्षाें तक पूरा नहीं होता । इसका अर्थ यह है कि १८ वर्ष से अल्प आयु के व्यक्ति द्वारा लिए जानेवाले किसी भी ‘सहमति’ के निर्णय में भावनाशीलता अथवा तात्कालिक आवेग का स्तर अधिक हो सकता है ।
१ आ. परिणाम के खतरों की अनदेखी : किशोर आयु के बच्चों में तत्काल संतुष्टि देनेवाले लालच का खतरा अधिक होता है । यह बच्चे अल्पकालीन आनंद के कारण उत्पन्न होनेवाले दीर्घकालीन सामाजिक, स्वास्थ्य तथा भावनात्मक खतरों की अनदेखी कर जाते हैं ।
२. धर्मशास्त्रीय आधार एवं संयम का महत्त्व

भारतीय धर्मशास्त्र व्यक्ति को पूर्ण रूप से नैतिक एवं भावनात्मक परिपक्वता आने तक संयम का पालन करने का महत्त्व विशद करते हैं ।
२ अ. ४ आश्रम एवं ब्रह्मचर्याश्रम का स्वरूप : हिन्दू धर्म में बताई गई जीवन-पद्धति के अनुसार मानव जीवन के १०० वर्ष के ४ चरण सुनिश्चित किए गए हैं । उनमें ब्रह्मचर्य (० से २५ वर्ष), गृहस्थ (२६ से ५० वर्ष), वानप्रस्थ (५१ से ७५ वर्ष) एवं संन्यास (७६ से १०० वर्ष)
ब्रह्मचर्याश्रम (० से २५ वर्ष) प्रथम चरण है, जो ज्ञानार्जन, कठोर संयम एवं आत्मिक बल के लिए समर्पित होता है । इस काल में यौन संबंध वर्जित माने जाते हैं । छात्र जीवन में इंद्रियों पर नियंत्रण (इंद्रिय निग्रह) रखना तथा विद्या संपादन करना ही मुख्य कर्तव्य होता है । अथर्ववेद बताता है, ‘ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत ।’ (अर्थववेद, काण्ड ११, सूक्त ५, श्लोक १९) अर्थात ‘ब्रह्मचर्य की कठोर तपस्या से देवताओं ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की ।’ अल्पायु बच्चों के यौन संबंधों को कानूनन वैध ठहराना इस पवित्र ‘ब्रह्मचर्य व्रत’ का उल्लंघन करने के लिए प्रोत्साहन देने जैसा है ।
२ आ. पुरुषार्थ, धर्म एवं काम : हिन्दू धर्म ने जीवन जीने के लिए धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष ये ४ उद्देश्य (पुरुषार्थ) सुनिश्चित किए हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के ७वें अध्याय के ११वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।।’ अर्थात ‘सभी सजीवों में से धर्म के लिए अनुकूल अर्थात शास्त्र को अनुकूल जो काम होता है, वह मैं हूं ।’ १८ वर्ष से छोटी आयु के व्यक्तियों के संबंध, जो विवाह संस्कार के बिना तथा गृहस्थ आश्रम के बाहर हैं, धर्म के विरोध में चले जाते हैं । अल्पायु की स्थिति में सहमति देकर ‘काम’ को ‘धर्म’ एवं ‘विवाह’ के बंधन से अलग करना अधर्म होता है ।
२ इ. रक्षा का राजधर्म : धर्मग्रंथ राजा अथवा राज्य का सर्वोच्च धर्म ‘दुर्बल एवं अल्पायु व्यक्तियों की रक्षा करना’ मानते हैं । ‘मनुस्मृति’ में (अध्याय ९, श्लोक ३) कौमार्य अवस्था में रक्षा की आवश्यकता स्पष्ट की गई है । भर्ता रक्षति यौवने ।’, (अर्थ : बचपन में पिता तथा युवावस्था में पति स्त्री की रक्षा करते हैं ।) इसका अर्थ ‘अल्पायु व्यक्ति पूर्णरूप से स्वतंत्र निर्णय लेने में अयोग्य है तथा उसके लिए अभिभावकों का, साथ ही राज्य के कानून का संरक्षण आवश्यक है । कानून का कर्तव्य यह है कि अल्पायु बच्चों में संपूर्ण परिपक्वता आने तक उन्हें सभी प्रकार के शोषण से बचाया जाए ।’
कुछ अपरिपक्व बडबोले लोग ‘कुमारी किसे कहें ?, इसकी व्याख्या कहां है ?’, ऐसा पूछ रहे हैं । इस प्रश्न का उत्तर ही, ‘पिता का संरक्षण क्यों आवश्यक है ?’, यह स्पष्ट करनेवाला है । जिस कन्या का कौमार्य भंग नहीं हुआ है अर्थात जिसका यौन संबंध नहीं हुआ है, वह कुमारी है ! इसीलिए धर्मशास्त्र ने कुमारी होने की स्थिति में पुत्री की रक्षा का दायित्व पिता को सौंपा है । धर्मशास्त्र सहमति की स्वतंत्रता नहीं देते, जबकि रक्षा का दायित्व देते हैं, साथ ही धर्मशास्त्र यौन संबंधों को मौज नहीं मानते, अपितु प्रजोत्पत्ति का साधन मानते हैं ।
३. अंतरराष्ट्रीय, लोकतांत्रिक एवं न्यायिक परिणाम
सहमति की आयुसीमा अल्प करने से उसके गंभीर सामाजिक एवं कानूनी दुष्परिणाम होंगे ।
३ अ. अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन : ‘संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन’ के अनुसार (UNCRC – युनाइटेड नेशन्स कन्वेक्शन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्ड) ‘बालक’ की व्याख्या ‘१८ वर्ष से छोटी आयु के व्यक्ति’, ऐसी की गई है । अतः सहमति की आयु अल्प की गई, तो भारत स्वयं की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता का उल्लंघन करेगा ।
३ आ. लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन : संविधान १८ वर्ष के ऊपर के व्यक्ति को मतदान का अधिकार देता है । सभी कानून १८ वर्ष से छोटी आयु के बच्चों को ‘अल्पायु’ मानते हैं । १८ वर्ष पूरे होने तक यदि मतदान का अधिकार नहीं मिलता, तो सहमति का अधिकार कैसे मिल सकता है ?
३ इ. न्यायिक एवं सामाजिक बोझ : सहमति के विवाद बढे, तो उससे न्यायालय अस्पष्ट प्रकरणों से भर जाएंगे, जिसके कारण प्रशासनिक एवं न्यायिक कामों का बोझ बढेगा । इसके साथ ही अल्पायु लडकियों को पारिवारिक दबाव के कारण अवांछित (इच्छा के विरुद्ध) गर्भपात अथवा विवाह करने के लिए बाध्य किया जाएगा, जिसके कारण उनकी प्रतिष्ठा के अधिकार का उल्लंघन होगा ।
३ ई. ‘पॉक्सो’ कानून दुर्बल होगा ! : ‘पॉक्सो’ कानून का मूल उद्देश्य ही यौन शोषण से अल्पायु बच्चों की रक्षा करना है । तो इसमें ‘सहमति की आयु’ अल्प की गई, तो उसके कारण इस कानून का मूल उद्देश्य ही दुर्बल हो जाएगा । बालिकाओं का शोषण करनेवाले १६ वर्ष की लडकी की ‘सहमति’ थी, ऐसा तर्क देंगे तथा उसके आधार पर वे स्वयं का बचाव करेंगे । १६ वर्ष की बालिका में सहमति एवं असहमति ज्ञात होने की मानसशास्त्रीय परिपक्वता न होने से ऐसा हो सकता है ।
इसका तात्पर्य यह है कि धार्मिक, मानसशास्त्रीय एवं सामाजिक दृष्टि से बच्चों को १८ वर्ष पूरे होने तक संपूर्ण संरक्षण देना आवश्यक है । उसके कारण उनका शारीरिक, मानसिक एवं शैक्षिक विकास सुरक्षित रहेगा ।
– श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था. (२२.११.२०२५)
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