द्रमुक के सांसद ए. राजा का संसद में चर्चा के समय दावा

नई दिल्ली – द्रमुक के सांसद ए. राजा ने संसद में ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा के समय टिप्पणी करते हुए दावा किया कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनंदमठ’ उपन्यास में ‘वंदे मातरम्’ गीत केवल हिन्दुओं के लिए लिखा था ।
🚩 DMK’s anti-Sanatan script exposed!
DMK MP A. Raja claims in Parliament: “Vande Mataram is only for Hindus!”
Adds that PM Modi’s dream is a “Hindu Rashtra”.
📝 Fact: Even Muslims once proudly chanted Vande Mataram. Congress later diluted it to appease vote banks by removing… pic.twitter.com/h4v98vZxiT
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) December 9, 2025
ए. राजा द्वारा प्रस्तुत बिंदु
१. ‘वंदे मातरम्’ की पंक्तियां अंग्रेजों के नहीं, अपितु मुसलमानों के विरुद्ध हैं !व
‘वंदे मातरम्’ की २० वीं शताब्दी के आरंभ से ही आलोचना होती रही है । ‘वंदे मातरम्’ की कुछ पंक्तियां केवल अंग्रेजों के ही नहीं, अपितु मुसलमानों के भी विरुद्ध हैं । आर.सी. मजूमदार ने कहा था, “बंकिमचंद्र ने देशभक्ति को धर्म में एवं धर्म को देशभक्ति में परिवर्तित कर दिया ।”
Discussion On The 150th Anniversary Of The National Song “VANDE MATARAM” In Lok Sabha#ARaja #ParliamentWinterSession #VandeMataram150 #KalaignarSeithigal@arivalayam @DMKITwing @dmk_youthwing pic.twitter.com/IcGzCGT9zZ
— A RAJA (@dmk_raja) December 8, 2025
२. टैगोर का मत : कांग्रेस इन आपत्तियों का प्रत्युत्तर दे रही थी । कांग्रेस के कुछ सदस्यों के आग्रह पर रवींद्रनाथ टैगोर ने भी अपना मत रखा । टैगोर ने एक पत्र में कहा था कि, “यदि पूरी कविता को उसके मूल संदर्भ के साथ पढा जाए, तो यह मुसलमानों की भावनाओं को आहत कर सकती है ।”
३. अनुशीलन समिति एवं धार्मिक अर्थ : वर्ष १९०२ में बंगाल में स्थापित अनुशीलन समिति का उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करना था । ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत की पदवी दिलाने के लिए सबसे प्रखर अभियान इसी समिति द्वारा चलाया गया था । अंग्रेजों द्वारा अधिग्रहित किए गए कागजापत्रों (दस्तावेजों) में पाया गया कि इस संगठन में मुसलमानों को संघर्ष कार्य में सम्मिलित होने की अनुमति नहीं थी । संगठन में प्रवेश के समय ली जाने वाली शपथ हिन्दुओं के लिए पवित्र थी, मुसलमानों के लिए नहीं । इससे स्पष्ट होता है कि ‘वंदे मातरम्’ का धार्मिक अर्थ क्या था ।
४. बढता धार्मिक तनाव एवं गांधीजी का दृष्टिकोण : वर्ष १९०५-१९०८ के समय बंगाल में मस्जिदों में नमाज पढने के समय हिन्दू जुलूसों में ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगा रहे थे । वर्ष १९०७ में ऐसे पत्रक वितरित किए गए जिनमें लिखा था कि ‘किसी भी मुसलमान को ‘वंदे मातरम्’ नहीं कहना चाहिए एवं स्वदेशी आंदोलन में भाग नहीं लेना चाहिए ।’ वर्ष १९०२-१९१५ के समय ऐसी घटनाओं में वृद्धि हुई । ब्रिटेन की संसद ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में भी इस गीत के कारण बढे धार्मिक तनाव पर चर्चा की गई । वर्ष १९०५ में महात्मा गांधी द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की प्रशंसा की गई; परंतु, वर्ष १९४० में उन्होंने अपनी भूमिका परिवर्तित कर दी । गांधीजी का सुझाव था कि ‘वंदे मातरम्’ धार्मिक नारा नहीं, अपितु राजनीतिक नारा है । “मुसलमानों का अपमान करने या उन्हें दुख पहुंचाने के लिए इसका उपयोग न करें,” यह गांधीजी का परामर्श था ।
५. मोदी तथा हिन्दू राष्ट्र का सपना : ए. राजा ने कहा, “वंदे मातरम्’ का सपना क्या था, यह मुझे पता नहीं; परंतु प्रधानमंत्री मोदी का सपना तो हिन्दू राष्ट्र ही है ।”
संपादकीय भूमिकाप्रारंभ में मुसलमान भी ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते थे । पश्चात उनका मतांतरण किए जाने के उपरांत वे ‘वंदे मातरम्’ का विरोध करने लगे । तत्पश्चात, कांग्रेस ने मुसलमानों के तुष्टीकरण के लिए वंदे मातरम् का अप्रत्यक्ष विरोध किया तथा उसमें श्री दुर्गादेवी का उल्लेख करने वाली पंक्तियां हटा दीं ! |
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