भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बडे षड्यंत्र से बच गए हैं । यह षड्यंत्र बहुत ही भयंकर था तथा इसके चलते भारत के प्रधानमंत्री के प्राणों पर बडा संकट आया था । अब कुछ मात्रा में उसका रहस्योद्घाटन हो रहा है । माध्यम था बांग्लादेश की राजधानी ढाका में एक अमेरिकी अधिकारी की हुई मृत्यु ! वास्तव में अमेरिकी अधिकारी टेरेंस अर्वेल जैक्सन को बांग्लादेश के सेंट मार्टिन द्वीप के संदर्भ में बांग्लादेश की सेना को प्रशिक्षण देने के लिए भेजा गया था । उसी दिन प्रधानमंत्री मोदी ‘शांघाय को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन शिखर सम्मेलन’ के लिए चीन के तेयानजिन में थे । यह अधिकारी प्रधानमंत्री मोदी की हत्या करने के लिए अमेरिकी गुप्तचर संगठन ‘सी.आई.ए.’ के एक बडे षड्यंत्र का भाग था । वास्तव में देखा जाए, तो रूस के गुप्तचर संगठन ‘के.जी.बी.’ एवं भारत के गुप्तचर संगठन ‘रॉ’ ने संयुक्तरूप से यह षड्यंत्र नाकाम कर दिया । उसमें इस गुप्तचर अधिकारी की मृत्यु होने की बात कही जा रही है; क्योंकि उस समय इस अधिकारी की मृत्यु का कोई भी समाचार सामने नहीं आया था तथा न ही उसकी मृत्यु का कारण खोजा गया । कुछ उत्तरदायी माध्यम प्रतिनिधियों की ओर से तथा माध्यमों से भले ही इस कारण का आंशिक रूप से रहस्योद्घाटन हो रहा हो, तब भी संबंधित सभी बिंदुओं को जोडा जाए; तो निश्चित रूप से यह एक षड्यंत्र था, यह कालांतर में स्पष्ट हो जाएगा ।
इस षड्यंत्र में सहभागी लोग चीन के शिखर सम्मेलन के उपरांत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के होटल से बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे । कुछ मिनट तक उन्होंने प्रतीक्षा की तथा उसके उपरांत इन दो लोगों को पुतिन की कार में बैठकर घूमते हुए तथा गोपनीय चर्चा करते हुए अनेक लोगों ने देखा । यह बातचीत ४५ मिनट की थी । उससे पूर्व बांग्लादेश में ‘सी.आई.ए.’, उनकी सहायता के लिए पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था ‘आई.एस.आई.’ तथा बांग्लादेश की सेना के कुछ उच्च अधिकारी मिलकर एक बडा षड्यंत्र रच रहे थे । वास्तव में देखा जाए, तो उससे कुछ महिने पूर्व से ही इस षड्यंत्र की योजना चलने की संभावना हो सकती है; परंतु रूस एवं भारतीय गुप्तचर संगठनों को इसकी भनक लगते ही एक रात में ही इस योजना के कार्यान्वयन के लिए आए उस अमेरिकी अधिकारी को मार गिराया गया । कूटनीति एवं अंतरराष्ट्रीय नीति की दृष्टि से यह एक असामान्य घटना ही है ।
रूस का पराक्रम !

इस घटना के विषय में न प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ कहा और न अमेरिकी सरकार ने उनका एक उच्चपदस्थ अधिकारी बांग्लादेश में कैसे मारा गया, इसका कुछ उल्लेख किया । जिसे इस घटना से जो बोध लेना था, उसने वह लिया ही है । वैसे कहा जाए, तो यह एक गुप्त घटना है । ऐसे गुप्त अभियान कुछ अवधि से होते रहते हैं अथवा गुप्तचरों का कार्य चलता रहता है । भले ही ऐसा हो, तब भी भारत जैसे एक विशाल देश के राष्ट्रप्रमुख के प्राणों पर संकट उत्पन्न करने का जब प्रयास होता है, तब वह एक बडा राष्ट्रीय संकट ही होता है । ऐसे समय में ऐसा कुछ करने का प्रयास करनेवाले व्यक्ति के साथ ही उनकी संपूर्ण व्यवस्था को ही नष्ट करना आवश्यक बन जाता है । हवाई अड्डे पर जब प्रधानमंत्री मोदी का तालियां बजाकर स्वागत किया जा रहा था, उस समय उन्होंने ‘आप किसलिए तालियां बजा रहे हैं, मैं गया था इसलिए या सुरक्षित पहुंच गया इसलिए ?’, ऐसा एक सूचक वक्तव्य दिया था । उनका यह सूचक वक्तव्य स्वयं रूस के राष्ट्रपति पुतिन द्वारा नरेंद्र मोदी की प्रतीक्षा करना तथा उनकी स्वयं की गाडी में उनके साथ संवाद करना, यह कोई सामान्य घटनाक्रम नहीं है । इससे ‘रूस ही भारत का सच्चा मित्र है तथा उसने प्रधानमंत्री मोदी के प्राण बचाए’, ऐसा कहा जा सकता है ।
शास्त्रीजी की रहस्यमय मृत्यु !
जनवरी १९६६ में तत्कालीन सोवियत संघ के ताश्कंद में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु हुई थी । इसमें मुख्य बात यह है कि वर्ष १९६५ में भारत-पाकिस्तान के मध्य जो युद्ध हुआ, उसमें तत्कालीन सोवियत संघ ने मध्यस्थता कर समझौता किया । यह समझौता ताश्कंद में किया गया । इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही मिनट उपरांत सो रहे शास्त्रीजी को अस्वस्थ लगने लगा तथा उनकी मृत्यु हो गई । शास्त्रीजी की मृत्यु का रहस्य आज भी रहस्य बना हुआ है । उस समय केवल दिल का दौरा पडना उनकी मृत्यु का कारण बताया गया था; परंतु उनके शरीर का काला-नीला पड जाना, उनकी गर्दन पर कुछ चोटें दिखाई देना जैसे तथ्यों की पडताल नहीं हुई तथा विशेष बात यह है कि उनका शवविच्छेदन ही नहीं हुआ, जिससे उनकी मृत्यु का वास्तविक कारण ज्ञात नहीं हुआ । ‘इतने बडे नेता की मृत्यु का यह प्रकरण दबाया गया’, ऐसा ही कहना पडेगा; क्योंकि शास्त्रीजी की मृत्यु के केवल १५ दिन उपरांत ही इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली । उसके उपरांत उनकी मृत्यु की सुई कभी अमेरिका के गुप्तचर विभाग की ओर, तो कभी रूस के गुप्तचर विभाग की ओर मोडी गई । यह षड्यंत्र किसने रचा ? उसमें कौन सहभागी थे ?, इस विषय से भारतीय अज्ञात रहे ।
अमेरिका हमारा शत्रु ही है !
अमेरिका भारत के परिप्रेक्ष्य में सदैव ही अविश्वसनीय बना रहा है । अमेरिका उसके मित्रों का भी विश्वासघात करता है । अमेरिका कब, कहां और कैसी चाल चलेगा, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता; क्योंकि उसका कारण है उसका महासत्ता होना ! महासत्ता की किसी भी कृति के विषय में न बोला जा सकता है और न पूछा जा सकता है ! अमेरिका के हितसंबंधों को बाधा पहुंचानेवाले व्यक्ति तथा देश के विरुद्ध षड्यंत्र रचकर उन्हें मिटाने से लेकर किसी देश में सत्तापरिवर्तन करवाकर वहां अपने विश्वसनीय लोगों को सत्ता में बिठाने तक उसकी पहुंच है । वर्तमान में इसका ताजा उदाहरण है बांग्लादेश की शेख हसीना की सरकार को गिराकर वहां युनूस को सत्ता में बिठाना ! सी.आई.ए. ने ही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी की हत्या की । ‘सी.आई.ए.’ के १९६० के दशक के एक प्रमुख रॉबर्ट क्रॉवले ने शास्त्रीजी सहित भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी भाभा की मृत्यु के विषय में भी रचे गए षड्यंत्र की पुष्टि की है । इसका अर्थ, दूर-दूर तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि अमेरिका के हितसंबंधों को कहीं बाधा उत्पन्न होनेवाली हो, तो वह उसे अपने मार्ग से दूर किए बिना नहीं रहता, यह ध्यान में आता है । यह ‘अमेरिका की विदेशनीति का ही भाग है’, ऐसा कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा । स्वयं का सर्वाेच्च स्थान अबाधित रखने हेतु अनेक देशों के मध्य झगडे कराना, पाकिस्तान को हथियार देकर भारत में आतंकी गतिविधियां चलाने की खुली छूट देना, पहले लादेन जैसे आतंकी को बल देकर उसे रूस के विरुद्ध लडाना और जब वह अमेरिका के लिए बोझ बन जाए, तब उसे मिटा देना, ऐसे किसी भी स्तर तक जानेवाला अमेरिका क्या कभी भारत का मित्र हो सकता है ? इसलिए भारत को अमेरिका से सतर्क रहना ही हितकारी है !
| भारत के राष्ट्रप्रमुख की हत्या का षड्यंत्र रचनेवाला अमेरिका क्या कभी भारत का मित्र हो सकता है ? |


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