हम इतिहास निश्चित नहीं कर सकते ! – उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया

नई दिल्ली – दिल्ली उच्च न्यायालय ने हिन्दी चलचित्र ‘द ताज स्टोरी’ के विरुद्ध प्रविष्ट दो जनहित याचिकाओं को निरस्त कर दिया है । याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि चलचित्र में की गई कुछ घोषणाएं इतिहास के अनुरूप नहीं हैं एवं इतिहास पर स्वतंत्र विचार व्यक्त किए गए हैं ।
🚨 Delhi High Court dismisses PIL against the film ‘The Taj Story’!
⚖️ “We cannot decide history,” said the Court while rejecting the plea filed by BJP spokesperson Rajneesh Singh, who had sought a ban on the movie.
🎬 The petitioner had claimed that the film was inspired by… https://t.co/GReKKyeqVV pic.twitter.com/RB0GIkYqdT
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) October 31, 2025
इतिहास पर भी, दो इतिहासकारों का मत भिन्न हो सकता है !
उच्च न्यायालय ने कहा कि हम ‘सुपर सेंसर बोर्ड’ (वरिष्ठ केंद्रीय चलचित्र सेंसर बोर्ड) नहीं हैं । आप कह रहे हैं कि ‘यह इतिहास नहीं है’; किन्तु क्या किसी भी कलाकृति में लेखक या निर्देशक को यह दिखाने के लिए ‘अस्वीकरण (अस्वीकरण कथन या स्पष्ट चेतावनी) देना आवश्यक है कि ‘यह इतिहास है/नहीं है’ ? इतिहास पर भी दो इतिहासकारों का मत भिन्न हो सकता है; किन्तु क्या हम सुनिश्चित करेंगे कि किस इतिहासकार का मत ठीक है ? हम किस मापदंड का उपयोग करके यह सुनिश्चित कर सकते हैं ? याचिकाकर्ताओं ने याचिका प्रविष्ट करने से पूर्व उचित शोध नहीं किया, एवं याचिका में अभिनेताओं (उदाहरण के लिए, चलचित्र के मुख्य पात्र परेश रावल) को पक्षकार बनाना उचित नहीं था । यदि भविष्य में अवमानना के विषय पर याचिका प्रविष्ट की जाती है, तो क्या अधिवक्ताओं को भी पक्षकार बनाया जाना चाहिए ? वे व्यावसायिक अभिनेता हैं, वे भविष्य के लिए उत्तरदायी नहीं हैं ।
अंततः उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी एवं सुझाव दिया कि वे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, १९५२ के अंतर्गत केंद्र सरकार के समक्ष आरोप प्रविष्ट कराएं। उच्च न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि ‘यदि केंद्र सरकार के समक्ष पुनर्विचार याचिका प्रविष्ट की जाती है, तो उस पर यथाशीघ्र निर्णय लिया जाएगा ।’
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