१८ मार्च १९९९ को बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की नेत्री राबडीदेवी दूसरी बार मुख्यमंत्री बनी थीं । उसी रात को लगभग ८ बजे वर्तमान के अरवल जिले के सेनारी गांव में (उस समय के जेहानाबाद जिले के) ५०० नक्सलियों का एक गुट बम एवं बंदूकें लेकर गांव में घुस गया । गांव से २ किलोमीटर की दूरी पर स्थित सहरसा गांव में एक पुलिस थाना था । उस थाने में केवल ६ पुलिसकर्मी थे । नक्सलियों ने उस पुलिस थाने पर आक्रमण कर उस पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया । लगभग २०० नक्सली पुलिस थाने पर नियंत्रण स्थापित किए हुए थे तथा शेष ३०० नक्सली सेनारी गांव की ओर बढे ।

१. नक्सलियों द्वारा सेनारी गांव में दिखाई क्रूरता तथा ‘विधवाओं का गांव’ के रूप में सेनारी गांव की पहचान !
सेनारी गांव पहुंचने पर नक्सलियों ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी जिंदाबाद’, ‘माओवाद जिंदाबाद’ तथा ‘लालूप्रसाद जिंदाबाद’ के नारे लगाए । उन्होंने भूमिहार समुदाय के किसानों के घरों पर आक्रमण किए । उन्होंने ‘डायनामाइट’ विस्फोटकों का उपयोग कर घरों की दीवारों को उडा दिया । उन्होंने ५० से अधिक भूमिहार किसानों की नृशंस हत्या की । सभी किसानों को एक कतार में खडा कर एक-एक का गला काटा गया, महिलाओं का शील लूटा गया तथा उनके गुप्तांगों पर बंदूक से, साथ ही चाकू से वार किए गए । रात के १२ बजे तक नक्सलियों ने गांव में उत्पात मचाया । ये नक्सली ‘कम्युनिस्ट पार्टी जिंदाबाद’, ‘माओवाद जिंदाबाद’ तथा ‘लालूप्रसाद जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे ।
नक्सलियों के वहां से चले जाने के उपरांत उत्तररात्रि ३ बजे पुलिस वहां पहुंची । पुलिस ने टॉर्च के प्रकाश में देखा, तो सर्वत्र शवों का ढेर लगा था । लोगों के गले से लहू के फव्वारे निकल रहे थे तथा उनकी अंतडियां बाहर निकली थीं । मानो वह एक पशुवधगृह ही था । इस घटना के उपरांत सेनारी गांव को ‘विधवाओं का गांव’ के नाम से जाना जाने लगा ।
१९ मार्च को पटना उच्च न्यायालय के तत्कालीन पंजीयन अधिकारी पद्मनारायण उनके सेनारी गांव पहुंचे । उनके परिवार के ८ लोगों के शव देखकर उन्हें दिल का दौरा पडा तथा कुछ ही समय में उनकी मृत्यु हो गई । इसके कारण ग्रामवासी और अधिक क्षुब्ध हुए । वह क्षण वहां के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत भयानक था ।
२. राष्ट्रपति शासन हटाए जाने के उपरांत घटित सेनारी हत्याकांड
उस समय केंद्र में भाजपा के अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार थी । केंद्र के मंत्री सेनारी गांव पहुंचे । उससे पूर्व जनवरी में शंकर बिगहा तथा फरवरी में नारायणपुर में हुए हत्याकांड के उपरांत अटल सरकार ने राबडी सरकार को अपदस्थ किया था; परंतु राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण केंद्र सरकार को ८ मार्च को बिहार से राष्ट्रपति शासन हटाना पडा; क्योंकि कांग्रेस ने लालूप्रसाद की सरकार को समर्थन दिया था । ९ मार्च को राबडीदेवी पुनः मुख्यमंत्री बनीं तथा उसके ९ दिन उपरांत यह सेनारी हत्याकांड हुआ । इस भयंकर घटना के उपरांत भाजपा ने राबडीदेवी के त्यागपत्र की मांग की ।
अटलबिहारी वाजपेयी ने उस समय देश को संबोधित करते हुए कहा, ‘इस नरसंहार के लिए कांग्रेस उत्तरदायी है; क्योंकि उन्होंने एक ऐसे दल को (राष्ट्रीय जनता दल को) समर्थन दिया है, जो ऐसे हत्याकांड के लिए कारण है ।’ क्योंकि उस समय कांग्रेस बिहार की राबडीदेवी सरकार में सहभागी थी ।
३. राज्यपाल के आदेश के अनुसार ग्रामवासियों को स्वरक्षा के लिए बंदूक रखने की अनुज्ञप्तियां दी जाना
ग्रामवासियों ने जब मुख्यमंत्री राबडीदेवी को सहायता देने तथा गांव का दौरा करने का अनुरोध किया, तब उन्होंने कहा, ‘जो लोग इसमें मारे गए हैं, वे हमारे मतदाता नहीं हैं, तो मैं वहां क्यों जाऊं ?’ इसके उपरांत वाजपेयी सरकार के आदेश पर बिहार के राज्यपाल बी.एम. लाल सेनारी गांव पहुंचे । ग्रामवासियों ने उनसे बंदूक रखने की अनुज्ञप्तियां मांगी । उन्होंने स्पष्टता से कहा, ‘राज्य सरकार हमारी सुरक्षा करेगी, इस पर हम विश्वास नहीं करते ।’ पटना लौटने पर राज्यपाल ने आदेश जारी किया, जिसके अनुसार ग्रामवासियों को बंदूक रखने की अनुज्ञप्तियां (गन लाइसेंस) दी गईं ।
४. सेनारी हत्याकांड में कांग्रेस ही रक्तपात की असली भागीदार !
सेनारी हत्याकांड मात्र किसी एक गांव का अथवा समुदाय का प्रश्न नहीं था, अपितु वह पूरे लोकतंत्र पर किया गया प्रहार था; परंतु इस नरसंहार के लिए केवल नक्सली उत्तरदायी नहीं थे, अपितु उन्हें समर्थन देनेवाले तथा मतों की राजनीति के लिए अपराधियों को संरक्षण देनेवाले सत्ताधारी भी उतने ही दोषी थे । लालू-राबडीदेवी की सत्ता को तात्कालिक आधार देनेवाली कांग्रेस ही इस रक्तपात की असली भागीदार है; क्योंकि बहुमत बचाए रखने के लिए उन्होंने बिहार की भूमि पर निर्दाेष लोगों का नरसंहार होने दिया । आज जब कांग्रेस स्वयं को लोकतंत्र की रक्षक कहती है, उस समय की सेनारी की विधवा महिलाएं, अनाथ बच्चे तथा काटे गए किसानों की छाया सदैव उनसे यह प्रश्न पूछती है, ‘आपने लोकतंत्र को बचाया या रक्तरंजित राजनीति को जन्म दिया ?’
– जयसिंग मोहन, पुणे
संपादकीय भूमिकाकांग्रेस ने लोकतंत्र को बचाया या रक्तरंजित राजनीति को जन्म दिया ? |
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