१. स्वभावदोष एवं अहं के निर्मूलन की प्रक्रिया का लाभ

अ. स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन की प्रक्रिया गंभीरता से, लगन के साथ तथा आनंद से की, तो १० से १५ दिन में ही प्रक्रिया कर रहे साधक के चेहरे में अच्छा परिवर्तन प्रतीत होता है ।
आ. चूकें टालने हेतु उचित दृष्टिकोण रखने के लिए स्वसूचनाएं भी देनी चाहिए ।
इ. उत्साहित मन हमें निरंतर कार्यरत रखता है । हमारे मन की समस्या हो, तो हमें लगता है कि ‘सोते रहें’ ।
ई. परिस्थिति का विचार न करते हुए, हमें सकारात्मक रहकर अपनी ओर से १०० प्रतिशत प्रयास करने चाहिए, तभी ईश्वर ‘आगे क्या करना है ?’, वह देख लेते हैं ।
उ. स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन की प्रक्रिया हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए है । प्रत्येक साधक को प्रक्रिया करनी ही चाहिए । हमें अपने मन के विचारों को ईश्वर से जोडना चाहिए ।
ऊ. प्रक्रिया का अर्थ है ‘प्रेरणा एवं क्रिया !’ ईश्वर द्वारा प्रेरणा दिए जाने पर ही उचित क्रिया होती है, अर्थात प्रक्रिया होती है ।
ए. कोई चूक हुई और वह हमारी नहीं है, तो भी सीखने की दृष्टि से उसका अध्ययन करना चाहिए । प्रत्येक स्थिति का सामना करने के लिए उचित दृष्टिकोण सीख लिया, तो आगे जाकर हमें भी समष्टि के साथ मेल बनाए रखना सरल हो जाता है ।
ऐ. सत्संग में प्रधानता से समष्टि स्तर की चूकें बताएं । उससे समष्टि को भी लाभ मिलेगा ।
संग्राहक : एक साधक
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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