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मुंबई – महाराष्ट्र में देवस्थानों की भूमियां बडी मात्रा में हडप ली गई हैं । इन भूमियों को वापस पाने एवं आगे ऐसे अतिक्रमणों को रोकने के लिए महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने राज्य सरकार से गुजरात की भांति (के अनुसार ) ‘एंटी लैंड ग्रैबिंग एक्ट’ लागू करने की मांग की थी । महासंघ की मांग पर, विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अधिवक्ता आशीष जायसवाल ने मंत्रालय में एक विशेष बैठक आयोजित की ।
इस बैठक में, राज्य मंत्री आशीष जायसवाल ने एक महत्त्वपूर्ण आदेश दिया कि देवस्थानों की हडप की गई भूमियों का पता लगाने के लिए राज्यभर के देवस्थानों की भूमियों का सर्वेक्षण किया जाए एवं जिलावार सूची तैयार की जाए । इसके साथ ही, उन्होंने विधि एवं न्याय विभाग को ‘एंटी लैंड ग्रैबिंग एक्ट’ का प्रारूप तैयार करने का भी आदेश दिया ।

इस बैठक में महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के राष्ट्रीय समन्वयक श्री. सुनील घनवट, श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग देवस्थान के अध्यक्ष अधिवक्ता सुरेश कौदरे, विदर्भ देवस्थान समिति एवं मंदिर महासंघ की कोर टीम के सदस्य श्री. अनुप जायसवाल (अमरावती), ह.भ.प. दत्तात्रय महाराज चोरगे (पुणे) सहित मुंबई, पुणे, विदर्भ, पश्चिम महाराष्ट्र, रत्नागिरी तथा सिंधुदुर्ग जिलों के प्रमुख देवस्थानों के न्यासी (विश्वस्त) एवं मंदिर प्रतिनिधि उपस्थित थे ।
मंदिर भूमि की बिक्री एवं कठोर कानून की आवश्यकता
सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट के कई फैसलों के अनुसार, राजाओं-महाराजाओं तथा अन्य लोगों द्वारा पूजा-अर्चना तथा देव कार्यों के लिए दी गई कृषि भूमि पुजारियों, सेवाधारियों, विश्वस्तों या किसी अन्य व्यक्ति को बेची या किसी अन्य के नाम पर नहीं की जा सकती । इन भूमियों की सुरक्षा का दायित्व (जिम्मेदारी) शासन एवं न्यायालय का है ।
इसके उपरांत, राज्य में कई देवस्थानों की सहस्रों (हजारों) एकड भूमि अवैध रूप से बेची गई है । वर्तमान में इन प्रकरणों में केवल दीवानी अभियोग ही किए जा सकते हैं, परंतु इस प्रकार के अतिक्रमणों को रोकने के लिए गुजरात, कर्नाटक, असम, ओडिशा, तमिलनाडु जैसे कई राज्यों ने फौजदारी दंड का प्रावधान करने वाला ‘एंटी लैंड ग्रैबिंग कानून’ लागू किया है । महाराष्ट्र में ऐसा कठोर फौजदारी कानून न होने के कारण भू-माफियाओं को लाभ मिल रहा है । इस समय साक्ष्यों के साथ सरकार को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसा कानून बनाने का आदेश दिया है ।
सिंधुदुर्ग देवस्थानों के लिए स्वतंत्र न्यासी मंडल हेतु प्रस्ताव प्रस्तुत करने के निर्देश !
वर्ष 1969 में सिंधुदुर्ग जिले के 245 देवस्थानों को ‘पश्चिम महाराष्ट्र देवस्थान व्यवस्थापन समिति’ कोल्हापुर को हस्तांतरित कर दिया गया था । इससे सिंधुदुर्ग के मंदिरों के पारंपरिक पुजारियों एवं सेवाकारियों को काम के लिए बार-बार 150 किमी दूर कोल्हापुर जाना पडता है तथा उन्हें समिति से कोई सहायता भी नहीं मिलती । राज्य मंत्री आशीष जायसवाल ने इन कठिनाइयों को समझते हुए निर्देश दिया कि सिंधुदुर्ग जिले के देवस्थानों को कोल्हापुर समिति से मुक्त कर, चैरिटी कमिश्नर के पास स्वतंत्र न्यासी मंडल नियुक्त करने के लिए विधि एवं न्याय विभाग के प्रधान सचिव को प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाए ।
कोंकण की हडप की गई ‘देवराई’ भूमि की जांच
महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने एक गंभीर सूत्र उठाया कि रत्नागिरी/कोंकण के देवस्थानों की ‘देवराई’ एवं ‘देवराहाटी’ के नाम से पहचानी जाने वाली सहस्रों (हजारों) एकड भूमि को अवैध रूप से देवस्थानों के 7/12 भू-अभिलेखों से हटाकर महाराष्ट्र सरकार के नाम पर पंजीकृत कर दिया गया है । यह अतिक्रमण वर्ष 2018 से तब आरंभ हुआ, जब अनाधिकृत प्रार्थनास्थलों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का अनुचित अर्थ लगाया गया ।
इस पर राज्य मंत्री जायसवाल ने आदेश दिया कि यह सर्वेक्षण किया जाए कि कितने 7/12 अभिलेखों से देवस्थानों के नाम हटाए गए हैं तथा उन देवस्थानों के नाम पर कितनी भूमि थी । उन्होंने चैरिटी कमिश्नर को भी इस प्रकरण में जांच करने के लिए कहा । उन्होंने देवस्थानों के न्यासियों (विश्वस्तों) को आश्वस्त किया कि कानून से बाहर जाकर कोई भी कार्रवाई नहीं कर सकता ।
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