उपवास का शास्त्र

‘उपवास रखने का भी एक शास्त्र है । व्रत के रूप में वर्षों से निरंतर उपवास रखना तथा स्वयं की जीभ की लालच को नियंत्रण में रखना सरल नहीं है । उपवास में मन के साथ अन्य इंद्रियों पर रखा जानेवाला कठिन संयम सीखने को मिलता है । ऐसे जितेंद्रिय व्यक्ति को बडी सहजता से अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है ।

 

१. उपवास निश्चित रूप से क्या होता है ?

‘उपावृत्तस्य पापेभ्यो सहवासो गुणैः सह ।

उपवास:स विज्ञेयः न शरीरस्य शोषणम् ।।’

पापों से दूर जाकर दैवीय/उत्तम गुणों के सान्निध्य में रहना उपवास है ! इसमें शरीर का शोषण अपेक्षित नहीं है । भले ही शास्त्रीय व्याख्या हो, तब भी लौकिक रूप से रखे जानेवाले उपवास में पहले बंधन आते हैं खान-पान पर ही ! उसका कारण पापों का प्रतिफल इंद्रियों के पास जाता है; इसलिए उन पर नियंत्रण रखना आवश्यक होता है । उसमें भी ‘रसनेंद्रीय’ पर नियंत्रण रखना सबसे कठिन है; इसलिए उस पर अधिक बंधन आते हैं ।

आयुर्वेद की परिभाषा में उपवास की बराबरी लंघन में स्थित ‘अनशन’, इस पद्धति से हो सकती है । जो आहार अथवा विहार (कृति) शरीर को लघु (हल्का) बनाता है, उसे शास्त्रों में ‘लंघन’ कहा जाता है । उपवास उन्हीं में से एक है ।

२. अनशन/उपवास किसे रखना चाहिए ?

अ. मोटा व्यक्ति

आ. कफ से संबंधित बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति

इ. चर्मरोगी

ई. आलसी व्यक्ति, जिन्हें निरंतर तथा बहुत नींद आती है तथा जिनका शरीर भारी होता है, ऐसे व्यक्ति

उ. गले की अथवा आंखों से संबंधित बीमारी से ग्रस्त

ऊ. प्रमेही व्यक्ति

ए. आमवात के रोगी (आमवात अपच से उत्पन्न होनेवाली जोडों के दर्द की बीमारी है ।)

ऐ. जिन्हें भूख नहीं लगती, ऐसे रोगी (अनेक रोगियों को वर्षों से जोर की भूख नहीं लगती; परंतु ‘दुर्बलता आएगी’, इस भय से वे प्रतिदिन ३ बार बहुत आहार लेते हैं । उनकी कष्टसाध्य बीमारी का कारण यही होता है ।)

ओ. अजीर्णता से ग्रस्त व्यक्ति (शरीर में हल्कापन होना, शुद्ध डकार, उचित मलप्रवृत्ति, ये सब अच्छे पाचन के लक्षण हैं । यदि इसके विरुद्ध लक्षण हों, तो उसे ‘अपच’ कहने में कोई आपत्ति नहीं है ।)

औ. नए सिरे से आरंभ (४८ घंटे के अंदर का) बुखार, उल्टियां, दस्त आदि बीमारियों से ग्रस्त रोगी

क. जलोदर के रोगी (पेट में पानी संग्रहित होना)

ख. सूजन आने के कष्ट से ग्रस्त रोगी

उक्त सभी रोगी वैद्य के सुझाव से उपवास रखें । इसके अतिरिक्त बैठा काम करनेवाले तथा दिनचर्या के नियमों का पालन न करनेवाले व्यक्ति भी सप्ताह में अथवा पंद्रह दिन में एक बार उपवास रखें । इसी को हमारे यहां धार्मिक स्वरूप देकर सर्वांगीण स्वास्थ्य पर ध्यान दिया गया है ।

वैद्या सुचित्रा कुलकर्णी

३. उपवास किसे नहीं रखना चाहिए ?

उपवास रखनेवाले व्यक्ति को कुछ भी हुआ, तो ‘पहले आप उपवास रखना बंद कीजिए’, यही सुझाव मिलता है । यह ज्ञानवश नहीं, प्रेमवश ही अधिक होता है । उपवास रखने के लिए कौन अयोग्य है, यह किसी को ज्ञात नहीं होता ।

अ. बारह वर्ष के अंदर के बच्चे, ६० वर्ष के ऊपर के वृद्ध, कृश/ पतले व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, स्तनपान करानेवाली माता, मदिरा का अतिसेवन करनेवाले व्यक्ति, अम्लपित्त, अल्सर, टी.बी. आदि
के रोगी

आ. नियमित जागरण करनेवाले व्यक्ति, भूख लगने पर भी प्रचुर मात्रा में शारीरिक परिश्रम करनेवाले अथवा व्यायाम करनेवाले व्यक्ति

इ. जब शुद्ध वातजन्य बीमारी होती है, ऐसी किसी बीमारी के उपरांत दुर्बलता आई हो (इस स्थिति में यदि भूख न लगे, तो वैद्य से सुझाव लें । रोगी पर पौष्टिक आहार की भरमार न करें ।)

ऐसे सभी लोग उपवास न रखें; क्योंकि उक्त लोगों के शरीर में पहले से ही बहुत सूखापन होता है । उपवास रखने से शरीर में शेष स्नेह भी अग्नि द्वारा सोख लेने पर उससे सूखापन और बढने की तथा जो स्थिति है, वह और विकट होने की संभावना होती है । ऐसे लोग वैद्य से सुझाव लेकर ही उपवास रखें ।

४. उपवास कब रखना चाहिए ?

अ. भूख न लग रही हो, तो तुरंत उपवास रखें ।

आ. उपवास रखनेयोग्य कोई बीमारी हो, तो चाहे कौनसी भी ऋतु हो; तब भी उपवास रखें ।

इ. चातुर्मास में भूख एवं पाचनक्षमता धीमी होती है; इसलिए उपवास रखें । ठंड के मौसम में पाचनक्षमता अच्छी होती है; इसलिए कभी-कभी उपवास रखने में कोई आपत्ति नहीं है । विशेषकर ‘पेट को विश्राम’ के रूप में ऐसा उपवास उपयुक्त सिद्ध होता है ।

५. उपवास कितने समय तक रखना चाहिए ?

कोई भी बीमारी दूर होने हेतु अनशन करना हो, तो वैद्य के मार्गदर्शन के अनुसार बीमारी ठीक होने तक उपवास रखें । भूख लगने तक उपवास रखना एक उत्तम मापदंड होता है । हमारे यहां दिन में उपवास रखकर सायंकाल में उपवास खोलने की पद्धति बहुत शास्त्रीय है ।

६. उपवास में खाने योग्य पदार्थ

वर्तमान समय में प्रचलित उपवास के पदार्थ पाचन के लिए भारी होते हैं । उन्हें खाने से लंघन तो होता ही नहीं, उल्टे अग्नि पर काम का तनाव बढता है । वास्तव में देखा जाए, तो उपवास का अर्थ है खाना पूर्णरूप से बंद; परंतु कुछ लोगों को ऐसे ही भूख लगने की भावना होती है । जब ‘मुझे कुछ नहीं खाना है’, ऐसा निर्धारित किया जाता है, तब यह भावना प्रखर होती है । ऐसे व्यक्ति गरम, हल्के तथा पाचन के लिए हल्के पदार्थ खाएं । थोडा-सा गाय का गरम दूध, कोई छोटा फल, छाछ, शर्बत, राजगीरे का लड्डू, खील, अनार, संतरा, मोसंबी; इनमें से कोई पदार्थ खाया जा सकता है ।

कर्नाटक राज्य में उपवास के समय एक पदार्थ (उदा. उपमा) खाने की जो पद्धति है, वह भी उचित है; परंतु वह पदार्थ पाचन के लिए भारी नहीं होना चाहिए । उपवास के समय चाय/कॉफी पीना टालें । दिन में नींद लेना तथा रात में जागरण, इस प्रकार से ‘निद्रा विपर्यय’ न करें ।

७. उपवास खोलते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

आठ घंटे से अधिक समय तक अनशन रखने से ईंधन के अभाव में अग्नि तात्कालिक रूप में धीमा पड जाता है । ऐसी स्थिति में दिनभर किए लंघन की भरपाई करते हुए प्रचुर मात्रा में आहार लिया, तो उसका पाचन नहीं होता; इसलिए हमारे यहां उपवास खोलने की भी एक पद्धति होती है ।

उपवास खोलते समय शांति से एक ही स्थान पर बैठकर भोजन करें । भोजन करते समय पूरा ध्यान भोजन की ओर हो । कुछ समय तक पेट में अन्न न जाने से सूखी अन्ननलिका को स्निग्ध बनाने हेतु भोजन के आरंभ में घी, फीकी दाल एवं चावल खाएं । उसे निगलने में कष्ट नहीं होता । उसके उपरांत पित्तशमन हेतु खीर/हलवा जैसा मीठा पदार्थ खाएं । उसके उपरांत भी भूख हो, तो रोटी-सब्जी अथवा चावल खाएं । उपवास खोलते समय आहार अल्प मात्रा में लें । भोजन में गरम, स्निग्ध तथा पाचन के लिए हल्के पदार्थों का समावेश हो । मूंग की फीकी दाल, लौकी, परवल अथवा तोरई की सब्जी, चावल की खिचडी जैसे पदार्थ हों । इस भोजन में मांसाहार, तले हुए पदार्थ, मिठाई, ठंडा पानी, शर्बत जैसे पदार्थ बिल्कुल भी नहीं होने चाहिए ।

८. उपवास के लाभ

उचित मात्रा में (अत्यधिक भी नहीं अथवा अति अल्प भी नहीं) उपवास रखा जाए, तो जो बीमारी ठीक होने के लिए उपवास रखा गया है, उदा. बुखार, दस्त, उल्टी इत्यादि, वह बीमारी ठीक होती है । शरीर हल्का होता है । थोडा-सा पसीना आता है । प्यास एवं भूख का भान होने लगता है । नींद अथवा ग्लानि घट जाती है । आलस अल्प होकर उत्साह बढता है । हृदय शुद्ध होकर वह नए उत्साह के साथ काम करने लगता है । वजन एवं रक्तशर्करा नियंत्रण में आती है ।

९. अति सर्वथा‌ वर्जित

उपवास के ये लाभ बहुत लालच देनेवाले हैं । उसके कारण अनेक लोग ‘डाएट’ के नाम पर कुपोषण होने तक उपवास रखते हैं । इससे भूख धीमी पड जाती है, वजन घटता है तथा शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता क्षीण होती है । शरीर में शक्ति न होने से आलस एवं नींद बढती है, चक्कर आता है तथा आवाज दब जाती है । जोडों में, पीठ में, कमर में तथा पसलियों में वेदना आरंभ होती है । शरीर में वात एवं पित्तदोष बढकर उधम मचाने लगते हैं । सूखापन बढने से त्वचा तेजहीन होती है तथा बाल झडने लगते हैं ।

इसका तात्पर्य यही है कि हम उपवास करने के योग्य हैं, यह सुनिश्चित कर नियमित तथा शास्त्रोक्त पद्धति से सप्ताह में अथवा पंद्रह दिन में एक बार एक दिन का उपवास रखा, तो वह स्वास्थ्य के लिए निश्चित ही लाभकारी सिद्ध होता है । निरंतर सात/नौ
अथवा अधिक दिन तक उपवास रखने हों, तो उसके लिए वैद्य से मार्गदर्शन लें । उपवास रखते समय यदि भूख लगी, तो ऐसी स्थिति में अग्नि की उपेक्षा न कर उसमें थोडीसी आहुति डालकर उसे प्रसन्न रखें ।

उपवास की अवधि में काम-क्रोधादि षड्रिपुओं से भी दूर रहना चाहिए । बिना उसके पाप से निवृत्ति कैसे मिलेगी भला ?’

– वैद्या सुचित्रा कुलकर्णी (संदर्भ : दैनिक तरुण भारत, १४.७.२०१९)