मंदिर ट्रस्ट को भी इस भूमि की जानकारी नहीं

शिकरापुर (जिला पुणे) : महाराष्ट्र के अष्टविनायकों में से एक रांजणगांव के श्री महागणपति देवस्थान के स्वामित्व में ढोक सांगवी (तहसील शिरूर) में स्थित ६५ एकर भूमि का क्षेत्र भूमि अभिलेख से (७/१२) से गायब दिखाई दिया है । इस विषय में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी शिवाजी असवले ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से न्याय की मांग की है ।
१. शिकरापुर के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी शिवाजी असवले ने मई २०२४ में शिरूर तहसील कार्यालय से इस मंदिर के स्वामित्ववाली ढोक सांगवी में स्थित ६५ एकर भूमि गायब होने की शिकायत की थी ।
२. इस संबंध में श्री. असवले ने १ वर्ष तक समीक्षा की, तब भी इस संबंध में किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई । अंततः राज्यपाल कार्यालय द्वारा शिरूर तहसील कार्यालय को निर्देश दिए जाने के उपरांत कार्रवाई आरंभ हुई । (इस प्रकरण में कार्रवाई के लिए इतना विलंब क्यों हुआ ? इसके लिए उत्तरदायी अधिकारियों की जांच कर उन पर कार्रवाई होना आवश्यक है ! – संपादक)
३. उक्त सभी संपत्तियां एल्.आर्. नं. १६ प्रविष्टिबही में की गईं प्रविष्टियों के अनुसार रांजणगांव मंदिर के नाम पर पंजीकृत की गई हैं; परंतु वर्ष १९२७ में कढईपत्रक (भूमि पर अधिकार दर्शानेवाला कागदपत्र) बनाते समय तथा उसके उपरांत ७/१२ प्रविष्टियां करते समय मंदिर की संपत्ति ‘इनाम वर्ग ३’ के अनुसार पंजीकृत न होकर किसी अन्य के ही नाम से ७/१२ आलेख बनाकर इन सभी संपत्तियों को वर्तमान में ‘इनाम वर्ग १’के नाम से पंजीकृत किया गया है ।
४. यह संपूर्ण ६५ एकर भूमि रांजणगांव मंदिर के स्वामित्व से गायब है तथा वह तत्काल मंदिर को वापस मिले, इसलिए समीक्षा की जा रही है, ऐसा श्री. असवले के अधिवक्ता हर्षल गोसावी ने बताया ।
कानूनी कार्रवाई करेंगे ! – स्वाती पाचुंदकर, अध्यक्षा, ‘रांजणगांव देवस्थान ट्रस्ट’

‘रांजणगांव देवस्थान ट्रस्ट’की अध्यक्षा स्वाती पाचुंदकर ने कहा कि देवस्थान का ६५ एकर भूमि यदि गायब हो अथवा वह मंदिर के स्वामित्व का होते हुए भी हमारे पास न हो, तो हम उस विषय में जानकारी लेंगे । उसके उपरांत इस प्रकरण को धर्मादाय आयुक्त के पास भेजकर उनके मार्गदर्शन में इस भूमि को पुनः मंदिर के स्वामित्व में वापस लेने हेतु कानूनी कार्रवाई करेंगे ।
प्रकरण को जिलाधिकारी कार्यांलय को भेज दिया है ! – तहसीलदार
शिरूरचे के तहसीलदार बाळासाहेब म्हस्के ने कहा, ‘‘इस प्रकरण की जानकारी मिलते ही मंडलाधिकारी की नियुक्ति कर हमने पुराने कागदपत्रों तथा प्रविष्टियों की पडताल की । शिकायतकर्ता जो कह रहे हैं, उसके अनुसार वतन प्रविष्टिबही में उस प्रकार से प्रविष्टियां हैं; परंतु कढईपत्रक एवं ७/१२ अभिलेख में ये प्रविष्टियां कैसे नहीं आईं तथा उसके कैसे अलग से ७/१२ अभिलेख बने ?, इसकी जानकारी नहीं मिल रही है । हमने इस प्रकरण को जिलाधिकारी कार्यालय को भेजा है ।’’
संपादकीय भूमिका
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