भिन्न-भिन्न उपकरणों से बनाई जानेवाली श्री गणेशमूर्तियां !
स्वतंत्रता संग्राम के काल में लोगों की मांग पर मोहनदास गांधी अथवा नेहरू के रूप में मूर्तियां बनाई जाती थीं । वर्तमान समय में भी कुछ स्थानों पर छत्रपति शिवाजी महाराज की भांति दिखनेवाली अथवा किसी संत की भांति दिखनेवाली मूर्तियां बनाई जाती हैं । फुटबॉल अथवा क्रिकेट खेल रहे गणेशजी अथवा बुलेट पर बैठे गणेशजी जैसी गणेशमूर्तियां भी बनाई जाती हैं । मुंबई के निकट कल्याण के एक गणेशोत्सव मंडल ने तो चिकित्सा उपकरणों से गणेशमूर्ति बनाई थी । उसमें सूंड के रूप में इंजेक्शन की सिरींज कान के रूप में किडनी ट्रे, मुकुट के रूप में बोतल, आंखों के रूप में कैप्सूल जैसे विभिन्न उपकरणों का उपयोग किया गया था । ऐसी मूर्तियां बनाते समय केवल कल्पना एवं आधुनिकता का अकारण एवं व्यर्थ मेल करने का प्रयास किया जाता है । यह सर्वथा अनुचित है; क्योंकि गणेशजी की तुलना नेता, सैनिक, खिलाडी इत्यादि के साथ नहीं की जा सकती । सस्ती लोकप्रियता एवं प्रसिद्धि हेतु गणेशमूर्ति का मानवीकरण किया जाता है । संत एवं देवता में अंतर है; इसलिए संतों के रूप में भी गणेशजी की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिए ।
देवता को विचित्र रूप में दिखाना देवता का अनादर है !
वर्ष १९५० में महाराष्ट्र की सरकार ने गणेशमूर्तियों के वेषांतर एवं मानवीकरण पर प्रतिबंध लगाया था; परंतु कालांतर में इन नियमों में ढील दी गई । भिन्न-भिन्न रूपों एवं वेशभूषाओं में बनाई जानेवाली मूर्तियों के कारण लोगों के मन में उस देवता के प्रति जो भाव होता है अथवा श्रद्धा होती है, वह प्रभावित होती है, साथ ही देवता को विचित्र रूप में दिखाना, उस देवता का अनादर ही है ।
देवताओं का मानवीकरण कर मनोरंजन के लिए उसका उपयोग करना महापाप है !
वर्तमान समय में डॉ. सुबोध केरकर, जुजे फिलीप परेरा जैसे कुछ धर्मद्रोही तथा हिन्दूद्रोही कलाकार देवताओं के विकृत चित्र बनाकर उन्हें लाखों रुपए में बेचते हैं । केवल आर्थिक लाभ के लिए देवताओं का इस प्रकार अनादर करना महापाप है ।

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