बंकीमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित ‘आनंदमठ’ उपन्यास का बीजमंत्र था, ‘वन्दे मातरम्’ । बंकीमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वन्दे मातरम्’ का उपयोग युद्ध की दहाड के रूप में कर अपने काव्य को रणगर्जना का रूप प्रदान किया । वर्ष १९३१ में कराची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ । उसमें गठित उपसमिति में हिन्दू-मुसलमान सदस्य थे । चर्चा के उपरांत समिति ने ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया । इस ‘वन्दे मातरम्’ की रचना का क्या इतिहास था ?, यह यहां दे रहे हैं ।
वन्दे मातरम् ।

सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम् मातरम् ।
वन्दे मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नाम् पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम् ।।
वन्दे मातरम् ।
१. ‘बंगदर्शन’ नियतकालिक का आरंभ !
वर्ष १८७२ में बंकीमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘बंगदर्शन’ नाम से एक नियतकालिक का संपादन आरंभ किया । वे सरकारी नौकरी में थे, इसके कारण उनका निरंतर स्थानांतरण होता रहता था । एक बार डेप्युटी मैजिस्ट्रेट के पद पर उनका स्थानांतरण हुआ ।
२. बंगदर्शन के एक अंक में खाली स्थान में बंकीमचंद्र द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ लिखा जाना
एक बार ‘बंकीमबाबू’ की पुकार सुनाई देने पर उन्होंने देखा, तो उनके सामने श्रीरामचंद्र बंदोपाध्याय खडे थे । वे विद्वान थे तथा बंगदर्शन में प्रकाशित लेखन पढते थे । उन्होंने बताया कि बंगदर्शन का अगला अंक २-४ दिन में प्रकाशित होनेवाला है तथा उसके अंतिम पृष्ठ पर लगभग आधे पृष्ठ का अथवा १० से १५ पंक्तियों का स्थान रिक्त है, तो उसका क्या किया जाए ? बंकीमचंद्र ने उस खाली स्थान पर लिखा ‘वन्दे मातरम् ।’
३. ‘वन्दे मातरम्’ लिखने से पूर्व सस्यश्यामल भूमि, दशभुजादेवी, फूलों का बाग जैसा दृश्य दिखाई देना
बंकीम जब कुछ लिखते थे, तब वे बिना रुके लेख पूरा करते थे; परंतु उससे कुछ दिन पूर्व उनका उस विषय पर चिंतन-मनन हुआ होता था । इस समय उन्हें सस्यश्यामल भूमि, दशभुजादेवी, फूलों का बाग जैसे आशय का दृश्य दिखाई दे रहा था । उन्होंने लिखना आरंभ किया –
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यशामलां मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं सुखदां वरदां मातरम् ।। १ ।।
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले, अबला केन मा एत बले ।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम् ।। २ ।।
उन्होंने पंडितजी को बुलाकर उन्हें यह कविता दिखाई । पंडितजी ने कहा, ‘‘ठीक है; परंतु इसमें भाषा अशुद्ध है । इसमें बांग्ला एवं संस्कृत, इन दोनों भाषाओं का मिश्रण है ।’’ उस पर बंकीमजी ने कहा, ‘‘यह अच्छा है अथवा बुरा, यह मैं नहीं जानता; परंतु आप इसे ऐसे ही छाप दीजिए । मेरा यह विश्वास है कि यह लोगों को अच्छा लगेगा ।’’
४. लोग तथा देश के विचारों से निर्मित ‘आनंदमठ’ उपन्यास तथा उसका बीजमंत्र ‘वन्दे मातरम्’ होना
वर्ष १८७६ तक बंगदर्शन ४ वर्षाें में बहुत लोकप्रिय हो चुका था; परंतु सरकारी नौकरी के कारण सभी प्रकार का लेखन करने में समस्या आती थी । अंततः उन्होंने ‘बंगदर्शन’ बंद करने का विचार किया । उन्होंने महाभारत का अध्ययन किया । उन्हें लगता था, ‘लोग तथा देश को एक सूत्र में बांधना होगा । एक-दूसरे से टूट चुके तथा एकसूत्र रहित लोगों में जागृति लाना आवश्यक है । मुझे अपने लेखन को नई दिशा देनी चाहिए ।’ इसकी फलोत्पत्ति ‘आनंदमठ’ उपन्यास के रूप में देखने को मिली । इस उपन्यास का बीजमंत्र था ‘वन्दे मातरम्’ ।
५. ‘वन्दे मातरम्’ एवं बंकीमचंद्र !
५ अ. ‘वन्दे मातरम्’ गाते समय स्वयं को भूलकर गानेवाले बंकीमचंद्र ! : उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ का उपयोग युद्ध की दहाड के रूप में कर अपनी कविता को रणगर्जना का रूप प्रदान किया । इस प्रक्रिया के लिए ८ वर्ष लगे । वर्ष १८८२ में ‘आनंदमठ’ उपन्यास छापा गया तथा वह बंकीमचंद्र का सबसे अधिक चर्चित उपन्यास सिद्ध हुआ ! जब-जब बंकीम ‘वन्दे मातरम्’ गाते थे, तब-तब उन्हें अपने अस्तित्व का भान नहीं रहता था । एक बार उन्होंने अपनी बडी बेटी को ‘वन्दे मातरम्’ सुनाया । वे उसमें इतने तल्लीन हो गए कि उनकी बेटी द्वारा उन्हें बार-बार पुकारे जाने पर भी वे होश में नहीं आए । जब उन्हें होश आया, तब उनकी बेटी ने उनसे कहा, ‘‘पिताजी, आप रो रहे थे ।’’
५ आ. ‘आनंदमठ’ के माध्यम से लोगों को जातिभेद भूलकर नवाबों के विरुद्ध संगठित होने का आवाहन करनेवाले बंकीमचंद्र ! : ब्रिटिश कार्यकाल में भारत के साथ अन्याय हो रहा है तथा भारतीयों का शोषण हो रहा है, ऐसा उनके ध्यान में आ रहा था । ‘अंग्रेजों के अत्याचार से यह देश मुक्त होना चाहिए’, ऐसा उन्हें लगता था; परंतु सरकारी नौकरी के कारण वे सीधे अंग्रेजों के विरुद्ध बोल नहीं पाते थे । उसके लिए उन्होंने ‘आनंदमठ’ की सहायता ली तथा लोगों को जातिभेद भूलकर नवाबों के विरुद्ध संगठित होने का आवाहन किया ।
६. कांग्रेस के अधिवेशन में ‘वन्दे मातरम्’ के पहले दो अंतरे गाए जाना तथा जवाहरलाल नेहरू की सूचना के अनुसार ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता प्राप्त होना
२८ से ३१ दिसंबर १८८५ की अवधि में मुंबई में कांग्रेस का पहला अधिवेशन संपन्न हुआ । वर्ष १८९६ में कोलकाता में अधिवेशन हुआ था । रवींद्रनाथ टैगोर ने उसमें ‘वन्दे मातरम्’ के पहले दो अंतरे गाए; परंतु ८ जून १८९४ को बंकीमचंद्र का निधन हो गया था । वर्ष १९३७ के कांग्रेस के अधिवेशन की सहसमिति के अध्यक्ष थे जवाहरलाल नेहरू ! उनकी सूचना के अनुसार ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया ।
७. अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ गाया जाना
वर्ष १९०५ में अंग्रेजों ने बंगाल के पश्चिम एवं पूर्व बंगाल के रूप में विभाजन की योजना बनाई । उस समय अनेक लोग उसके विरुद्ध आंदोलन करने के लिए सडकों पर उतरे । इस आंदोलन में रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वन्दे मातरम्’ गाया । छात्रों ने भी ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगाए । इतना कुछ हुआ, तब भी ‘आनंदमठ’ पर कभी प्रतिबंध नहीं लगा; परंतु ‘वन्दे मातरम्’ बोलनेवालों को कारागृह जाना पडता था । अंग्रेजों को कदाचित ऐसा लगा होगा कि ‘आनंदमठ’ के कारण हिन्दू-मुसलमानों में शत्रुता बढेगी तथा उन्हें उसका लाभ मिलेगा ।
८. ‘वन्दे मातरम्’ के तीसरे अंतरे से भारतमाता एवं श्री दुर्गादेवी का एकरूप होना
‘वन्दे मातरम्’ के तीसरे अंतरे से आगे भारतमाता एवं श्री दुर्गादेवी एकरूप हो जाते हैं । उसमें कहा गया है, ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी कमला कमलदलविहारिणी वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम् ।’ इस पर भिन्न धर्मी लोग आपत्ति जता सकते हैं; परंतु ‘वन्दे मातरम्’ बोलते हुए जो लोग फांसी पर चढ गए अथवा काले पानी का दंड भुगतने के लिए चले गए, वे सभी वीर भारतमाता की स्वतंत्रता की अपेक्षा रखते थे ।
९. गांधी द्वारा उनके पत्रों का समापन ‘वन्दे मातरम्’ मोहनदास’, ऐसा किया जाना
वर्ष १९२० तक गांधी उनके पत्रों का समापन ‘वन्दे मातरम्’ मोहनदास’, लिखकर करते थे । उन्होंने उनकी प्रार्थनासभाओं में हिन्दी में बोलना आरंभ किया । उन्होंने ‘रामधुन’ के साथ ‘वन्दे मातरम्’ को भी अपनाया ।
१०. बंकीमचंद्र द्वारा प्राप्त कराया गया मंत्र : ‘वन्दे मातरम्’ !
वर्ष १९०६ में अरविंद घोष ने ‘वन्दे मातरम्’ नाम से नियतकालिक का संपादन करना आरंभ किया । वर्ष १९०७ में उन्होंने इसी ‘वन्दे मातरम्’ में लिखा, ‘‘आज से ३२ वर्ष पूर्व बंकीमजी ने एक महागीत की रचना की थी । उस समय कुछ ही लोग ‘वन्दे मातरम्’ को जानते थे; परंतु उसके उपरांत एक मंगल मुहूर्त पर बांग्ला जनता एक लंबी नींद से जाग उठी । उसने सत्य की खोज में सभी ओर दृष्टि डाली तथा ईश्वरीय संकेत से निर्धारित सुमुहूर्त पर कोई गाने लगा । सभी को ‘वन्दे मातरम्’ मंत्र प्राप्त हुआ !’’
११. वर्ष १९३१ में ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करना !
वर्ष १९३१ में कराची में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ । इस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक उपसमिति गठित की गई, जिसमें हिन्दू-मुसलमान सदस्य थे । एक लंबे विचारमंथन के उपरांत समिति ने ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया ।
१२. भारत का राष्ट्रगान बना ‘वन्दे मातरम्’
सुभाषचंद्र बोस का कहना था कि ‘वन्दे मातरम्’ के केवल प्रथम दो ही अंतरों को स्वीकार किया जाना चाहिए । इसके लिए उन्होंने संबंधित लोगों के साथ पत्राचार कर उन्हें कारण सहित सहमतिपत्र लिखकर भेजा । इस प्रकार ‘वन्दे मातरम्’ भारत का राष्ट्रगान बन गया । वर्ष १९०६ के कांग्रेस के अधिवेशन में सरला घोष ने एक उद्बोधन गीत के रूप में इसे गाया था ।
१३. ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रतिष्ठा, जबकि ‘जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान का गौरव प्राप्त हुआ !
स्वतंत्र भारत में २५ अगस्त १९४८ की संविधान समिति की सभा में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन-गण-मन’ के प्रथम दो अंतरों को राष्ट्रगान की श्रेणी मिली । उस समय भारत की विभिन्न भाषाओं में अनेक राष्ट्रीय गीत लिखे गए । २४ जनवरी १९५० को ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई गई तथा ‘जन-गण- मन’ को राष्ट्रगान का सम्मान दिया गया ।
(भवंस नवनीत : अगस्त २०२१ से भाषांतरित किया गया लेखन)
अनुवादक : यशवंत लेले (साभार : साप्तहिक ‘विवेक’, मराठी)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?