अक्षय तृतीया को उच्च लोक से आनेवाली सात्त्विकता ग्रहण करने हेतु पूर्वज इस दिन पृथ्वी के समीप आते हैं । मानव पर पूर्वजों का बहुत ऋण भी है । ईश्वर को अपेक्षित है ये ऋण चुकाने हेतु मानव प्रयास । इसलिए अक्षय तृतीया पर पूर्वजों को गति मिलने हेतु तिलतर्पण करना होता है ।

देवता
पद्धति : प्रथम देवताओं का आवाहन करें । तांबे की अथवा कोई भी सात्त्विक धातु की थाली हाथ में लें । ब्रह्मा अथवा श्रीविष्णु का अथवा उनके एकत्रित रूप का, अर्थात दत्त का स्मरण कर उन्हें थाली में आने का आवाहन करें । तदुपरांत ‘देवता सूक्ष्म से वहां पधारे हैं’, ऐसा भाव रखें । तिल में श्रीविष्णु एवं ब्रह्मा के तत्त्व आए हैं’, ऐसा भाव रखकर तिल हाथ में लें । तदनंतर ‘उनके चरणों पर तिल अर्पण कर रहे हैं’, ऐसा भाव रखें ।
परिणाम : प्रथम (सूक्ष्म से आए हुए देवता के चरणों पर) तिल अर्पण करने से तिल में देवताओं द्वारा प्रक्षेपित सात्त्विकता अधिक मात्रा में ग्रहण होती है एवं जल अर्पण करने पर अर्पण करनेवाले व्यक्ति का भाव जागृत होता है । भाव जागृत होने के कारण तिलतर्पण करनेवाले व्यक्ति के लिए देवता द्वारा तिल में प्रक्षेपित की हुई सात्त्विकता अधिकाधिक मात्रा में ग्रहण करना सरल होता है । इससे ध्यान में आता है, ‘भगवान को भाव प्रिय है ।’ भाव एवं अहं अर्पण करने पर भगवान बहुत कुछ देते हैं ।

पूर्वज
पद्धति : (पूर्वज सूक्ष्म से पधारे हैं एवं उनके चरणों पर देवता के तत्त्वों से संचारित तिल एवं जल अर्पण कर रहे हैं, ऐसा भाव रखें ।) दूसरी थाली में अपने पूर्वजों का आवाहन करना होता है । पूर्वजों को तिल अर्पण करने से पूर्व तिल में श्रीविष्णु एवं ब्रह्मा के तत्त्व आने हेतु देवताओं से प्रार्थना करें । तदनंतर ‘पूर्वज सूक्ष्म से आए हैं एवं हम उनके चरणों पर तिल एवं जल अर्पण कर रहे हैं’, ऐसा भाव रखें । तदनंतर दो मिनट उपरांत देवता के तत्त्वों से संचारित तिल एवं अक्षत पूर्वजों को अर्पण करें । यह सात्त्विक तिल हाथ में लेकर थाली में उसपर धीरे से पानी छोडें । उस समय दत्त भगवान, ब्रह्मा अथवा श्रीविष्णु से पूर्वजों को गति देने हेतु प्रार्थना करें ।
परिणाम : (तिलतर्पण के कारण पूर्वजों के सूक्ष्म देह की सात्त्विकता बढकर उन्हें अगले लोक में जाने हेतु आवश्यक ऊर्जा मिलना एवं मानव को हो रहे पूर्वजों के कष्ट ५ से १० प्रतिशत अल्प होना) तिल में सात्त्विकता ग्रहण होकर रज-तम नष्ट करने की क्षमता अधिक है । साधक के भाव के अनुसार तिलतर्पण करते समय सूक्ष्म से थाली में आए पूर्वजों की प्रतीकात्मक सूक्ष्म देह पर विद्यमान काला (कष्टदायक शक्ति का) आवरण दूर होकर उनकी सूक्ष्म देह की सात्त्विकता बढती है एवं उन्हें आगे के लोक में जाने हेतु आवश्यक ऊर्जा मिलती है । प्रथम देवता को तिल अर्पण करने से साधक को सात्त्विकता प्राप्त होती है एवं उसका भाव ४० प्रतिशत से अधिक होने के कारण उसके आसपास ईश्वर सूक्ष्म से सुरक्षा-कवच का निर्माण करते हैं । इस कारण पूर्वजों को तिलतर्पण करते समय साधक को कष्ट नहीं होता । तिलतर्पण के कृत्य से मानव को होनेवाले पूर्वजों के कष्ट ५ से १० प्रतिशत अल्प हो जाते हैं ।
– ईश्वर (सुश्री (कु.) मधुरा भोसले, सनातन आश्रम, गोवा.
| सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है । |
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