सीतामाता ही भारतीय नारी का आदर्श हैं ! – स्वामी विवेकानंद

१. स्त्री को शिक्षा देते समय ‘धर्म’ को केंद्रस्थान में रखा जाए, तो उससे स्त्रियों में शील उत्पन्न होना तथा आवश्यकता पडने पर शीलभ्रष्ट होने के स्थान पर प्राणों का बलिदान देने में उन्हें बिल्कुल भी भय न लगना : धर्म को केंद्रस्थान में रखकर ही स्त्री शिक्षा का प्रचार होना चाहिए । अन्य सभी शिक्षाएं धर्म की तुलना में गौण होनी चाहिए । धर्मशिक्षा, शीलसंवर्धन तथा कठोर ब्रह्मचर्यपालन की ओर ध्यान देना होगा । ‘सतीत्व’ का अर्थ हिन्दू महिलाएं सहजता से समझ सकती हैं; क्योंकि उस धरोहर को साथ लेकर ही वे जन्म लेती हैं । अन्य किसी भी बात पर बल देने की अपेक्षा पहले उनमें इस आदर्श को सुस्थापित करने का भरसक प्रयास करें । इससे उनमें ऐसे अति उन्नत शील का निर्माण होगा, जिसके बल पर विवाहित अथवा अविवाहित (उन्होंने यदि अविवाहित रहने का निर्णय लिया) अवस्था में उन्हें शीलभ्रष्ट होने का भय नहीं रहेगा; अपितु वे उसकी रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेंगी ।

२. एकमात्र ‘सीताचरित्र’ से ही संपूर्ण स्त्रीत्व का भारतीय आदर्श विकसित होने के कारण, सीतामाता ही भारतीय स्त्रीत्व का आदर्श हैं : सीतामाता के पदचिन्हों का अनुसरण कर आर्यावर्त की स्त्रियों द्वारा अपनी प्रगति का मार्ग निश्चित करना उचित है । सीतामाता का चरित्र अनुपम है । यथार्थ भारतीय स्त्रीत्व का प्रारूप हैं सीतामाता; क्योंकि उनके एकमात्र ‘सीताचरित्र’ से ही संपूर्ण स्त्रीत्व का भारतीय आदर्श विकसित हुआ है ।

३. स्त्री के जीवन को सीताचरित्र से दूर ले जाकर उसमें आधुनिकता लाने का कोई भी प्रयास तत्काल निष्फल सिद्ध होता है, इसमें संदेह नहीं : अति पवित्र, सहनशीलता तथा सहिष्णुता की मूर्ति वे महिमाशालिनी सीतामाता उस पद पर अटल रहेगी ! जिसने मुंह से एक अक्षर भी निकाले बिना, वह कटुकठोर दुखमय जीवन व्यतीत किया, वे सदाशुद्ध एवं परम पतिव्रता सीतामाता आर्यजनों की आदर्श देवी तथा हमारी राष्ट्रदेवी हैं, जो हमारे हृदयसिंहासन पर चिरंतन अधिष्ठित रहेंगी ! हमारे रोम-रोम में सीतामाता का आदर्श भरा है । हमारे स्त्री जीवन को सीतामाता के चरित्र से दूर ले जाकर उसमें आधुनिकता अंतर्भूत करने का कोई भी प्रयास तत्काल निष्फल होता है, यह हम प्रत्यक्षरूप से देख ही रहे हैं ।

– स्वामी विवेकानंद (शिक्षण, पृ. ६३-६५) (संदर्भ : जीवन-विकास, अक्टूबर २००१)