महिलाओ, स्वयं में विद्यमान देवीतत्त्व को जागृत करने हेतु धर्माचरण तथा साधना करो !

स्त्रियो, स्वयं में विद्यमान चैतन्यरूपी देवीतत्त्व अनुभव करो !

स्त्री घर का चैतन्य है । उसके बिना घर बहुत सूना-सूना लगता है । जिस घर में स्त्री होती है, वह घर भरा हुआ लगता है । उसका कारण यही होता है कि उसमें विद्यमान प्रकट-अप्रकट शक्ति के कारण ईश्वर का अस्तित्व प्रतीत होकर घर में प्रसन्नता प्रतीत होती है ।

प्रत्येक स्त्री में देवीतत्त्व होता है । प्रत्येक स्त्री को स्वयं में विद्यमान आपके (देवी के) अस्तित्व को टिकाए रखने हेतु हिन्दू संस्कृति के अनुसार आचरण करना होगा । आपकी उपासना कर स्वयं में विद्यमान देवीतत्त्व को टिकाए रखने हेतु प्रयास करने होंगे ।

– एक साधिका

आदिशक्ति से मनौती !

‘हे भवानीमाता, आपके बिना मैं कंगाल हूं । आपमें जो वात्सल्य है, वह इस पूरे विश्व की किसी भी बात में अनुभव नहीं होता । मेरा जीवन आपके प्रेम के बिना अधूरा है । हे भवानीमाता, मेरा जन्म भी आपके कृपाप्रसाद के कारण ही हुआ है । आप ही एक स्त्री का दुख समझ सकती हैं; क्योंकि प्रत्येक जीव आपका ही अंश तथा आपका ही रूप होने के कारण उसका दुख समझने की क्षमता आपमें ही है । हे मां, प्रत्येक स्त्री को यह क्षमता आपके कारण ही प्राप्त होती है । विश्व का कार्य सुचारू रूप से संचालित होने हेतु श्रीविष्णु को आदिशक्ति की आवश्यकता पडती है । आपके बिना विश्व का कार्य संपन्न नहीं हो सकता ।

हे माता, विश्व के कार्य अर्थात उत्पत्ति हेतु आपके शक्तिरूप के तत्त्व की आवश्यकता पडती ही है । ‘जगत्जननी’ होने के कारण कुल के उद्धार हेतु आप प्रत्येक स्त्री को शक्ति प्रदान करती हैं । हे भवानीमाता, प्रत्येक स्त्री में आपका वास होने के कारण बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक की आंतरिक विचारप्रक्रिया में परिवर्तन आपके कारण ही होता है; क्योंकि प्रत्येक स्त्री में विद्यमान आपकी प्रकट-अप्रकट शक्ति अंतर्मन से स्त्रीरूप के तैयार करती रहती है । उसके कारण संघर्ष एवं त्याग कर एक कुल का उद्धार करने में उसे सफलता मिलती है । प्रत्येक कुल के उद्धार हेतु कुलदेवी की आवश्यकता होती है ।

हे माता, अब आप ही हममें विद्यमान देवीतत्त्व को जागृत करें । हमें शक्ति प्रदान करें तथा इस स्त्रीजन्म को सफल होने हेतु हमसे साधना करवा लें !

– एक साधिका