
‘गुरुपूर्णिमा गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने एवं गुरुकार्य की वृद्धि के लिए त्याग करने का संकल्प लेने का दिन है । व्यापक स्वरूप का गुरुकार्य हिन्दू धर्म का कार्य है एवं वर्तमान कालानुसार व्यापक गुरुकार्य धर्मसंस्थापना का कार्य अर्थात हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का कार्य है । अध्यात्म के अनेक अधिकारी संत यह कार्य कर रहे हैं । गुरुपूर्णिमा के दिन ऐसे संतों के मार्गदर्शन में हिन्दू धर्म एवं हिन्दू राष्ट्र के कार्य के लिए तन-मन-धन का त्याग करने का संकल्प करना ही कालानुसार गुरुतत्त्व को अपेक्षित गुरुदक्षिणा होगी ।
त्याग हिन्दू धर्म की सीख है । तन-मन-धन एवं आगे सर्वस्व का त्याग किए बिना आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती । तन का त्याग अर्थात शरीर से राष्ट्र एवं धर्म के लिए कार्य करना, मन का त्याग अर्थात नामस्मरण करना अथवा राष्ट्र एवं धर्म के कार्य का चिंतन करना तथा धन का त्याग अर्थात इस कार्य के लिए स्वयं का धन अर्पित करना । यह त्याग चरण-प्रति-चरण करने के उपरांत एक दिन सर्वस्व का त्याग करने की मन की तैयारी होती है । वर्तमान काल में सर्वस्व का त्याग है, स्वयं का संपूर्ण जीवन हिन्दू धर्म एवं हिन्दू राष्ट्र के कार्य के लिए समर्पित करना । धर्मनिष्ठ हिन्दुओं, साधकों एवं शिष्यों को आध्यात्मिक उन्नति के लिए हिन्दू धर्म एवं हिन्दू राष्ट्र के कार्य के लिए अपनी क्षमता के अनुसार त्याग करने की बुद्धि हो, यह श्री गुरु के चरणों में प्रार्थना है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था.
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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