
१. ‘भगवान के आंतरिक सान्निध्य में रहना’, यह ज्ञान होने के लिए गुरुदेवजी की आवश्यकता होती है । बडे-बडे ग्रंथों का वाचन करना, यह कोई सच्चा ज्ञान नहीं है । उन ग्रंथों का सारांश समझकर उसके अनुसार आचरण करना, यही सच्चा ज्ञान है ।’
२. ‘शुद्धता में सभी तत्त्व समाहित होते हैं । शुद्धता ही ईश्वरीय गुणों का दर्शन है ! साधना से शुद्धता का अंगीकार होता है । माया के कर्माें से देह अशुद्ध होती है । अशुद्धता ही वासना एवं माया में अटकना, जबकि शुद्धता अर्थात वासनाओं का निराकरण तथा ईश्वर की ओर क्रमण करना ! वासनाओं का निराकरण करने हेतु साधना की आवश्यकता है ।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ (२४.४.२०२०)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !