१. सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के इर्द-गिर्द प्रकाशमान वृत्त प्रतीत होने पर ‘उनमें आध्यात्मिक शक्ति वास कर रही है’, ऐसा ध्यान में आना

एक बार प.पू. आठवले गुरुजी से (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी) से मिलना हुआ था । उस समय मुझे उनके आस-पास एक प्रकाशमान वृत्त बहुत स्पष्टता से प्रतीत हुआ । उसे देखकर ‘आध्यात्मिक शक्ति मात्र कल्पना नहीं है, अपितु वह वास्तविकता है तथा वह शक्ति प.पू. गुरुजी में वास कर रही है’, यह बात उनके अल्पकालीन सान्निध्य में ही मेरे ध्यान में आई ।
२. ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी अध्यात्म के विषय में कुछ बताएंगे’, ऐसा लगना परंतु उनके द्वारा अत्यंत सहजतापूर्ण तथा मित्रता के भाव से संवाद किया जाना
प.पू. आठवले गुरुजी में विद्यमान आध्यात्मिक शक्ति प्रतीत होने पर मुझे लगा, ‘वे मुझे (साधना के विषय में) कुछ बातें बताएंगे’; परंतु मेरे साथ संवाद करते समय मानो ‘मैं उन्हीं में से एक हूं’, इस मित्रता के भाव से वे मेरे साथ बात कर रहे थे । उन्होंने ही मुझसे संगीत के विषय में विभिन्न प्रश्न पूछकर जान लिया तथा ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय देखकर आपको क्या अनुभव हुआ ?’, यह भी पूछा । मेरे लिए यह पूर्णतः भिन्न अनुभव था तथा मुझे उससे अच्छा बोध भी मिला ।

३. ‘सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी द्वारा संगीत से संबंधित किए शोधकार्य के कारण कलाकार साधकों का दिशादर्शन होकर उनका जीवन सार्थक होगा’, ऐसा लगना
‘अध्यात्म, कला तथा उसमें भी गायनकला का सीधा संबंध है’, इसमें कोई संदेह नहीं । प.पू. गुरुजी ने इस विषय में अत्यंत गहरा शोधकार्य किया है । उस शोधकार्य का गायनकला के लिए उत्तरोत्तर अधिक उपयोग होगा । इससे कला तथा कलाकार साधकों का जीवन वास्तव में सार्थक होगा । आज की कला कलाकार को अंतर्मुख बनाने के स्थान पर बहिर्मुख बना रहीर है । ऐसे में प.पू. गुरुजी द्वारा बनाए गए सिद्धांत ही सच्चे कलाकारों का दिशादर्शन करते रहेंगे ।
४. प.पू. आठवलेगुरुजी का कार्य आनेवाली अनेक पीढियों को प्रेरणा देता रहेगा !
८१ वें ब्रह्मोत्सव के उपलक्ष्य में प.पू. गुरुजी को अनेक शुभकामनाएं तथा इस उपलक्ष्य में उनके चरणों में शतशः नमन !’
– पंडित निषाद बाकरे, शास्त्रीय गायक, ठाणे. (२३.४.२०२३)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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