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बरेली (उत्तर प्रदेश) – २०१० के बरेली दंगा प्रकरण की सुनवाई के समय बरेली न्यायालय के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने कहा, “यदि सत्ता में बैठे लोग धार्मिक हैं, तो इसके अच्छे परिणाम सामने आते हैं।” इसके लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उदाहरण दिया। सुनवाई के करते हुए न्यायालय ने धार्मिक व्यवस्था से जुडे मौलाना तौकीर रजा खान को दंगों का मुख्य सूत्रधार बताते हुए ´न्यायालय की उपस्थिति सूचना´ जारी की है। इस प्रकरण की आगामी सुनवाई ११ मार्च को निश्चित की गई है।
वर्ष २०२२ में जब वे वाराणसी न्यायालय में न्यायाधीश दिवाकर पदासीन थे तब उन्हों ने ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण की अनुमति दी थी। उन्होंने उस समय यह भी बताया था, कि उन्हें धमकियां मिली हैं और वह अभी भी सुरक्षा व्यवस्था में रह रहे हैं।
न्यायालय ने क्या कहा?न्यायमूर्ति रवि कुमार दिवाकर ने कहा, ”यदि कोई धार्मिक व्यक्ति सत्ता के केंद्र में हो तो अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं।” राजनीतिक दार्शनिक प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में इसका उल्लेख किया है। वर्तमान समय में न्याय की अवधारणा का प्रयोग कानून के सन्दर्भ में किया जाता है; किन्तु प्लेटो के समय में न्याय की अवधारणा का प्रयोग धर्म के संदर्भ में किया जाता था। इसीलिए एक धार्मिक व्यक्ति को सत्ता के शीर्ष पर होना चाहिए; क्योंकि धार्मिक व्यक्ति का जीवन अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण के लिए होता है। उदाहरणार्थ; सिद्धपीठ गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर महंत बाबा योगी आदित्यनाथ वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने इन सभी बातों को सत्य सिद्ध कर दिया है। |
धमकी के कारण घर से निकलते समय सदैव विचार करना पडता है! – न्यायमूर्ति दिवाकर
ज्ञानवापी प्रकरण का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा कि इस प्रकरण में सर्वेक्षण का निर्णय देने के उपरांत धमकी भरे पत्र आए थे। तब से मेरे परिवार में एक तरह का डर बना हुआ है।’ मैं इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। परिवार में सभी को सबकी अत्यंत चिंता रहती है। घर से बाहर निकलते समय प्राय: सोचना पडता है। (ध्यान दें कि धर्मांध कट्टरपंथी हिंन्दुओं के पक्ष में दिए गए निर्णय को स्वीकार नहीं करते और स्वयं न्यायाधीशों को धमकाते हैं, ‘मुसलमान इस देश में असुरक्षित हैं’! यह कहने वाले इस तथ्य को दुर्लक्षित करते हैं- संपादक)
संपादकीय भूमिकाधर्म मनुष्य को स्थिरता प्रदान करता है, जिसके फलस्वरूप उसके कार्य की फलनिष्पत्ति कई गुना बढ जाती है। इसके साथ ही सिद्धांतवादीता और प्रामाणिकता भी अधिक हो जाती है। माननीय न्यायाधीश को यह परामर्श देना है; परन्तु ये बात केवल हिंन्दुओं पर ही लागू होती है। अन्य धर्मों के इतिहास, शिक्षा और प्रकृति को देखते हुए ‘क्या हम उनके संबंध में यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं?’, लोगों के मन में यह यक्ष प्रश्न उठता है! |
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