
‘अनेक साधकों को तीव्र अथवा मध्यम स्तर का आध्यात्मिक कष्ट है । ‘व्यष्टि अथवा समष्टि साधना में चूकें होने पर कुछ साधकों के मन में ‘मुझे हो रहे आध्यात्मिक कष्ट के कारण यह चूक हुई’, यह विचार आ रहा है, ऐसा ध्यान में आया है ।
वास्तव में देखा जाए, तो कोई भी चूक आध्यात्मिक कष्ट के कारण नहीं, अपितु साधकों में विद्यमान स्वभावदोषों अथवा अहं के कारण होती है । अनिष्ट शक्तियां आध्यात्मिक कष्ट का अनुचित लाभ उठाकर साधकों में जो मूल रूप से स्वभावदोष एवं अहं होते हैं, उनका स्तर बढाते हैं । इसलिए साधकों द्वारा हुई चूकों के विषय में अंतर्मुखता से चिंतन किए बिना आध्यात्मिक कष्ट का कारण आगे बढाने से साधकों की साधना की हानि होती है । साधक कोई भी चूक होने पर उसके मूल स्वभावदोष अथवा अहं के पहलुओं का चिंतन करें तथा उनके निर्मूलन के लिए उत्कंठापूर्ण प्रयास करें ।’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळ, सनातन आश्र्म, रामनाथी, गोवा. (१०.१०.२०२२)
आध्यात्मिक कष्टइसका अर्थ है व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन होना । मंद आध्यात्मिक कष्ट अर्थात व्यक्ति में नकारात्मक स्पंदन ३० प्रतिशत से अल्प होना । मध्यम आध्यात्मिक कष्ट अर्थात नकारात्मक स्पंदन ३० से ४९ प्रतिशत होना; और तीव्र आध्यात्मिक कष्ट अर्थात नकारात्मक स्पंदन ५० प्रतिशत या उससे अधिक मात्रा में होना । आध्यात्मिक कष्ट प्रारब्ध, पितृदोष आदि आध्यात्मिक स्तर के कारणों से होता है । किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक कष्ट को संत या सूक्ष्म स्पंदन समझनेवाले साधक पहचान सकते हैं । |
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
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