
औषधियों के साथ आयुर्वेद ‘दैवी चिकित्सा’ भी बताता है । अधिकतर किसी भी शारीरिक बीमारी में कुछ स्तर पर आध्यात्मिक तथा कुछ स्तर पर मानसिक भाग होता है । रोग के मूल कारण की खोज करते समय आयुर्वेद उसके आध्यात्मिक पक्ष (पहलू) की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है । आयुर्वेद में बताया गया है, ‘औषधि के अपेक्षित परिणाम न होनेवाले रोग, पिछले जन्म में की गई चूकों अर्थात प्रारब्ध के कारण होते हैं । आयुर्वेद ने १४ प्रकार की दैवी चिकित्सा बताई है । मंत्र; औषधियां; मणि (ग्रहों के पत्थर); होम एवं यज्ञ; प्रायश्चित एवं व्रत; उपवास; दान; जप; तप; द्विज (ब्राह्मण), देवता एवं गुरु की पूजा; द्विज एवं संतों का सम्मान, सत्संग; सभी प्राणियों के प्रति मित्रता की भावना; योगाभ्यास एवं ध्यान धारणा; साथ ही कुलाचार आदि सूत्र इसके अंतर्गत आते हैं ।
सनातन के सहस्रों साधकों ने इसका अनुभव किया है, ‘मंत्रोपाय, जप करना, स्तोत्र का पाठ करना, कुदृष्टि निकालना (नजर उतारना), देह पर स्थित काली शक्ति का आवरण निकालना इ. आध्यात्मिक उपचारों से कुछ बीमारियां ठीक होती हैं, उनकी तीव्रता अल्प होती है या संबंधित औषधियां उन बीमारियों पर लागू होती हैं ।’
मंत्रोपाय
परात्पर गुरु पांडे महाराजजी ने अनेक रोगों के लिए मंत्रोपाय दिए, जिससे सनातन के अनेक साधकों की बीमारियां ठीक हुईं अथवा अल्प हुईं । उन्होंने अनेक संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन कर उन मंत्रों की खोज की है ।
पूर्वजों के कष्टों के कारण होनेवाली बीमारियों के उपाय
आज के समय में समाज के अधिकांश व्यक्तियों को पूर्वजों के कष्ट होते हैं । कुछ बीमारियां पूर्वजों के कष्टों के कारण होती हैं । ‘श्री गुरुदेव दत्त’ जप करने से पूर्वजों के कष्ट अल्प होकर वो ठीक होती हैं । ‘ssrf.org’ (‘एसएसआरएफ डॉट ओआरजी’) जालस्थल पर इसके उदाहरण दिए गए हैं ।
प्राणवहन संस्था में समाहित बाधाओं के कारण होनेवाली बीमारियों के उपाय
श्वसन, पाचन, मज्जा इ. तंत्रों, साथ ही रक्ताभिसरण हेतु प्राणवहन (चेतना) प्रणाली प्राणशक्ति की आपूर्ति करती है । उसमें बाधा आने से संबंधित अंगों की कार्यक्षमता न्यून होकर बीमारियां उत्पन्न होती हैं । कभी-कभी चिकित्सीय परीक्षण में परीक्षण सामान्य आते हैं; परंतु कष्ट होता है । ऐसे में संबंधित तंत्र या अंग में समाहित प्राणशक्ति (चेतना) क्षीण होने के कारण वह बीमारी होती है । सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने हिन्दू धर्म में निहित ज्ञान का उपयोग कर प्राणशक्ति (चेतना) प्रणाली में विद्यमान अवरोध खोजने की पद्धति, साथ ही विभिन्न मुद्राओं, न्यासों तथा जपों के संदर्भ में स्वयं प्रयोग कर बीमारियां ठीक होने हेतु सनातन के साधकों को यह उपचार-पद्धति बताई । इसमें हाथ की उंगलियों की मुद्राएं तथा जप कर विशिष्ट कुंडलिनी चक्र के स्थान या अंगों के स्थान पर न्यास करना होता है । २०१० से सनातन के सहस्रों साधकों को इसका लाभ मिलने से अब यह एक प्रमाणभूत शास्त्र ही बन चुका है ।
प.पू. डॉक्टरजी ने देवताओं का एक छोडकर एक जप, खाली बक्सों के उपाय इ. विशेषतापूर्ण उपचार-पद्धतियों का भी शोध किया है ।
बीमारियों के लिए देवताओं के नामजप
मनुष्य की देह पंचमहाभूतों से बनी होती है; इसलिए उनमें से किसी तत्त्व का असंतुलन होने से बीमारियां उत्पन्न होती हैं । ये विकार भी पंचतत्त्वों से संबंधित होते हैं । प्रत्येक देवता में भी पंचतत्त्व होते हैं । देवता में विद्यमान पंचतत्त्वों में से किसी तत्त्व की प्रबलता के अनुसार वह देवता उस तत्त्व से संबंधित बीमारी शीघ्र ठीक (स्वस्थ) कर सकते हैं । पंचतत्त्वों से संबंधित बीमारी के लिए प्रयुक्त नामजप के साथ मुद्रा एवं न्यास करने से उपायों से अधिक लाभ मिलता है । सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने विकार निर्मूलन के लिए प्रयुक्त नामजप का शोध किया है ।
सनातन के सद्गुरु डॉ. मुकुल गाडगीळजी ने भी विभिन्न रोगों के लिए विशिष्ट नामजपों का शोध किया है ।
– वैद्य मेघराज पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.
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