अलक्ष्मी नि:सारण

अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता, दैन्य और आपदा । नि:सारण करने का अर्थ है बाहर निकालना । अलक्ष्मी नि:स्सारण हेतु दीपावली काल में लक्ष्मीपूजन के दिन नई बुहारी अर्थात झाडू घर में लाते हैं । इस झाडू से मध्यरात्रि के समय घर का कुडा निकालकर बाहर फेंका जाता है । मध्यान्ह रात को `लक्ष्मी’ मानकर उसका पूजन करते हैं । उसकी सहायता से घर का कूडा निकालते हैं । कूडा अलक्ष्मी का प्रतीक है । कूडा निकालकर घर के पीछे के द्वार से उसे बाहर निकालकर दूर फेंकते हैं । कूडा बाहर फेंकनें के उपरांत घर के कोने-कोने में जाकर सूप अर्थात छाज बजाते हैं । अन्य किसी भी दिन मध्यरात्रि के समय कुडा निकाला नहीं जाता ।
कूडा बाहर फेंकने की सूक्ष्म-स्तरीय प्रक्रिया
मध्यरात्रि में रज-तमात्मक तरंगोंकी सर्वाधिक निर्मिति होती है । ये तरंगें घर में विद्यमान रज-तमात्मक कूडे की ओर आकृष्ट होती हैं । इस रज-तमात्मक तरंगोंसे भरपूर कूडे को सूपमें (छाज) भरकर वास्तु से बाहर फेंकने से वास्तुकी रज-तमात्मक तरंगें नष्ट होती हैं और वास्तु शुद्ध होती है । इससे सात्त्विक तरंगें वास्तु में सरलता से प्रवेश कर पाती हैं । वास्तु में श्री लक्ष्मीपूजन द्वारा आकृष्ट चैतन्य का लाभ बढता है ।
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