डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी की याचिका पर निजी और राजनीतिक होने की टिप्पणी
‘मंदिरों का सरकारीकरण होने के पश्चात मंदिर में पूजा से लेकर श्रद्धालुओं की व्यवस्थातक, मंदिरों की संपत्ति से लेकर मंदिर व्यवस्थापन में राजनीतिक दलों में राजनीतिक दलों के असंतुष्टों की भर्ती करनेतक किस प्रकार मनमानी से काम चलता है’, यह हिन्दुओं का आजतक का कटू अनुभव है । इसका विचार कौन करेगा ?

देहरादून (उत्तराखंड) – उत्तराखंड भाजपा सरकार ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में चारधाम और ५१ मंदिरों का सरकारीकरण उचित होने का दावा करनेवाला शपथपत्र प्रस्तुत किया है । इस सरकारीकरण के विरोध में न्यायालय में भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी द्वारा प्रविष्ट याचिकापर न्यायालय ने सरकार का मत मांगा था । उसके अनुसार सरकार ने यह शपथपत्र प्रस्तुत किया है । सरकार ने इस शपथपत्र में ‘यह याचिका निजी और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित होने’ की भी टिप्पणी की है ।
१. उत्तराखंड सरकार ने इस शपथपत्र में आगे कहा, ‘प्राकृतिक आपदा एवं भविष्य में चारधाम तीर्थयात्रा का अधिक अच्छी प्रकार से आयोजन करने हेतु उनका सरकारीकरण करना आवश्यक था ।’ इसके लिए सरकार ने श्री वैष्णोदेवी मंदिर, श्री साईबाबा मंदिर, श्री जगन्नाथ मंदिर, श्री सोमनाथ मंदिर आदि मंदिरों के सरकारीकरण का संदर्भ दिया है ।
२. इस शपथपत्र में ‘डॉ. स्वामी की याचिका जनहित याचिका की श्रेणी में नहीं आती । डॉ. स्वामी एक राजनीतिक व्यक्ति है । उन्होंने अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक हितों के लिए यह याचिका प्रविष्ट की है ।’, यह भी दावा किया गया है ।
डॉ. स्वामी के सूत्रपर उत्तराखंड सरकार का मौन !
डॉ. स्वामी ने अपनी याचिका में वर्ष २०१४ में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तमिलनाडू के चिदंबरम् जनपद के श्री नटराज मंदिर के सरकारीकरण से संबंधित दिए गए निर्णय का संदर्भ दिया था । इस निर्णय में न्यायालय ने कहा है कि मंदिरों का व्यवस्थापन सरकार की ओर से नहीं, अपितु भक्तों के द्वारा ही किया जाना चाहिए । उत्तराखंड सरकार के शपथपत्र में इस सूत्रपर किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं की गई है ।
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