अष्टविनायकों के इतिहास में अद्वितीय एवं स्वर्णिमक्षण ।

पुणे – मोरगांव के श्री मयुरेश्वर गणपति मंदिर में एक ऐतिहासिक एवं अनमोल धरोहर सामने आई है । राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय की ओर से मंदिर में चल रहे संवर्धन एवं जीर्णोद्धार के कार्य में अत्यंत दुर्लभ २ प्राचीन ‘ताम्रपट’ (तांबे की पट्टियों पर अंकित शिलालेख) मिले हैं । अष्टविनायक मंदिरों के दीर्घ इतिहास में इस प्रकार से गर्भगृह से सीधे ताम्रपट अथवा शिलालेख मिलने की यह पहली ही घटना है ।
पुरातत्व विभाग के सहायक निदेशक विलास वाहाणे द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार राज्य सरकार के १४८ करोड रुपए के ‘अष्टविनायक विकास एवं संवर्धन प्रारूप’ के अंतर्गत वर्तमान समय में मोरगांव मंदिर का जीर्णाेद्धार चल रहा है । इसके अंतर्गत मंदिर के मुख्य गर्भगृह में श्री गणेश की मूर्ति के इर्द-गिर्द कुछ वर्ष पूर्व लगे ग्रैनाइट, आधुनिक संगमरमर एवं तांबे-कांसे का प्रभामंडल (तेजोमंडप/अलंकारिक कमान) को शास्रोक्त पद्धति से हटाने का काम चल रहा था । यह आधुनिक आवरण हटाते ही विशेषज्ञों के दल को उसके पीछे स्थित छिपी मंदिर की मूल सुंदर प्राचीन पत्थर की कमान सामने आई । इस पत्थर की कमान के अंदर अत्यंत सुरक्षित पद्धति से जडे गए २ प्राचीन ताम्रपट दिखाई दिए ।

ताम्रपटों पर अंकित ऐतिहासिक संदर्भ एवं कालखंड ।
प्राथमिक निरीक्षणों के अनुसार मिले २ ताम्रपटों में से एक ताम्रपट पर शक १५४७ (वर्ष १६२५) तथा दूसरे ताम्रपट पर शक १६३२ (वर्ष १७१०), इसप्रकार से सुस्पष्टता से कालखंड का उल्लेख किया गया है ।
इस ऐतिहासिक ताम्रपटों का प्रमुखता से निम्न बातों से संबंध हैं ।
इन ताम्रपटों में इस मंदिर का मूल निर्माणकार्य, नवीनीकरण एवं विभिन्न कालखंडों में भक्तों एवं राजाओं द्वारा दिए गए चंदे का विस्तृत उल्लेख, पुणे के निकट के चिंचवड के गाणपत्य संप्रदाय के महान संत श्रीमंत मोरया गोसावी के समाधि मंदिर की मूल रचना एवं विस्तार का सीधा उल्लेख, साथ ही पत्थर का निर्माण कार्य करने वाले उस काल के प्रसिद्ध कारीगर नारायणदेव तथा उनकी वास्तु-कुशलता का गौरवपूर्ण उल्लेख किया गया है ।
इससे गाणपत्य सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध होगी ।
पुणे के सुप्रसिद्ध इतिहासकार तथा ‘भारत इतिहास शोध मंडल’ के सचिव पांडुरंग बलकवडे ने इस शोध का अत्यंत उत्साह के साथ स्वागत करते हुए कहा कि ताम्रपटों को इतिहास के सबसे विश्वसनीय एवं समकालीन लिखित प्रमाणपत्र (दस्तावेज) माना जाता है, क्योंकि उसमें जिस काल में संबंधित घटना होती है, उसी काल को अंकित किया जाता है । श्री मयुरेश्वर मंदिर के गर्भगृह से प्राप्त ये प्रमाण महाराष्ट्र एवं गाणपत्य संप्रदाय की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं वास्तुकला के इतिहास को अत्यधिक समृद्ध करनेवाले हैं ।
मराठा साम्राज्य का काल एवं इतिहास की पुनर्रचना ।
पुणे के पेशवा श्री गणेश के भक्त थे, इसलिए मोरगांव के वर्तमान मंदिर का निर्माण पेशवा काल में किया गया होगा, ऐसा माना जाता है । तथापि इस शोध के कारण मंदिर का काल एवं पीछे अर्थात मराठा साम्राज्य के काल तक सुनिश्चित करने में सहायता मिल सकती है । वर्ष १७१३ के उपरांत ही पेशवा मराठा साम्राज्य के प्रमुख के रूप में सत्ता में आए ।
परिसर के ऐतिहासिक जतन को प्रधानता
राज्य सरकार की ओर से चलाए जा रहे ‘अष्टविनायक संवर्धन प्रारूप’आराखडा’, इस १४८ करोड रुपए की लागत के विशेष संवर्धन अभियान में ८ में से ७ स्वयंभू मंदिरों का जीर्णाेद्धार किया जा रहा है । उनमें मोरगांव, सिद्धटेक, पाली, महड, थेऊर, ओझर एवं रांजणगांव इन मंदिरों का समावेश है । पुणे जिले के जुन्नर के पास स्थित लेण्याद्री मंदिर पहाड में स्थित गुफा में है तथा वह ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’की कार्यकक्षा में आने से वह इस अभियान में अंतर्भूत नहीं है । अष्टविनायक मेले का आरंभ एवं समापन मोरगांव से ही होता है; इसलिए इस परिसर के ऐतिहासिक जतन को प्रधानता दी जा रही है ।
लिपि का रहस्य भेदन करने हेतु ‘भारतीय पुरातत्व विभाग’की सहायता ली जाएगी ।
प्राप्त ताम्रपट देवनागरी एवं संस्कृत लिपि में अंकित हैं । इस संपूर्ण लेखन का गहन वाचन करने हेतु राज्य पुरातत्व विभाग अब ‘भारतीय पुरातत्त्व विभाग’ की सहायता लेगा ।
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