क्रीमी लेयर’ को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का प्रश्न
(‘क्रीमी लेयर’ का अर्थ यह है कि पिछडे वर्गों में जिनका वार्षिक आय ८ लाख रुपये से अधिक है, उन्हें सरकारी नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण नहीं दिया जाता । ऐसे लोग ‘क्रीमी लेयर’ की श्रेणी में आते हैं।)

नई दिल्ली — यदि माता-पिता दोनों भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस. – इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस) के अधिकारी हों, तो उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए ? ऐसा प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय ने उपस्थित किया । न्यायालय ने आर्थिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से प्रगत पिछडे वर्गीय परिवारों के बच्चों को आरक्षण का लाभ शुरू रखने पर यह प्रश्न किया । कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक निर्णय के विरुद्ध दायर याचिका पर खंडपीठ सुनवाई कर रही थी । इस निर्णय में याचिकाकर्ता को ‘क्रीमी लेयर’ मानते हुए आरक्षण का लाभ देने से मना कर दिया गया था ।
🚨 “Why reservation for their children when both parents are IAS officers?” – Supreme Court questions the concept of the ‘Creamy Layer’ ⚖️
If even children from highly privileged families continue claiming reservation benefits, how will genuinely deprived sections get… pic.twitter.com/TZahyQvvr6
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) May 23, 2026
यदि हम बच्चों के लिए आरक्षण मांगते रहेंगे, तो हम इससे कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे !
याचिकाकर्ता के माता-पिता दोनों राज्य सरकार के कर्मचारी हैं । न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना तथा न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने इस पर कहा कि यदि माता-पिता अच्छी नौकरी में हों और अच्छा आय अर्जित कर रहे हों, तो बच्चों को आरक्षण व्यवस्था से बाहर आ जाना चाहिए । ऐसे समृद्ध वर्ग को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के निर्देश सरकार पहले ही दे चुकी है । यदि हम बच्चों के लिए आरक्षण मांगते रहेंगे, तो हम इससे कभी बाहर नहीं निकल पाएंगे ।
याचिकाकर्ता का चयन ‘कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन’ में आरक्षित वर्ग से सहायक अभियंता पद पर हुआ था; किन्तु जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने उसे ‘क्रीमी लेयर’ में सम्मिलित किया । इसलिए उसे जाति वैधता प्रमाणपत्र प्रदान नहीं किया गया । उसके माता-पिता की संयुक्त आय ‘क्रीमी लेयर’ की ८ लाख रुपये की सीमा से अधिक है ।
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