मंदिर प्रबंधन का कर्तव्य !

आरंभ में मंदिरों की व्यवस्था देखने के लिए पुजारी एवं उनके कुछ सहयोगी ही पर्याप्त होते थे; परंतु आधुनिक काल में बढती जनसंख्या एवं धार्मिकता के कारण समाज में देवताओं के प्रतीक इन मंदिरों में बडी संख्या में भीड दिखाई देती है । श्रद्धालु इन मंदिरों में जाकर देवता के दर्शन करते हैं तथा बडे स्तर पर दान भी देते हैं । अनेक मंदिरों में अन्नछत्र चलाए जाते हैं, निर्धनों को सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, गोशाला एवं विभिन्न प्रकार के कौशल विकास की योजनाएं चलाई जाती हैं; इसलिए मंदिर मात्र धार्मिक स्थल न रहकर, समाज को एकत्रित करने तथा बांधकर रखने के स्थान बन गए हैं । आधुनिक काल में मंदिर प्रबंधन सुचारु रूप से चलने के लिए कुछ बातों का तथा नियमों का पालन करना आवश्यक है । बडे स्तर पर आनेवाले दान का उचित विनियोजन करना तथा उसका उचित लेखा-जोखा रखना भी आवश्यक है ।

मंदिर में आनेवाले श्रद्धालुओं को सुविधाएं मिलनी चाहिए । धार्मिक कार्यक्रमों के समय बडी संख्या में उमडनेवाली भीड को नियंत्रित करने के लिए भीड का सुचारु रूप से संचालन होना आवश्यक है । इन सबके कारण भारत में वर्तमान स्थिति में ‘मंदिर प्रबंधन’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है ।

भारतीय परंपराएं, संस्कृति एवं मूल्यों को संजोने के केंद्र हैं मंदिर ! इसी कारण ‘धार्मिक कार्य को केवल एक उद्देश्य न मानकर वह समाज को एकत्रित बांधकर रखने का साधन है’, ऐसा मानना होगा । मंदिर प्रबंधन एक सर्वसमावेशक प्रक्रिया है । उनका संबंध आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्रों से होता है । इसीलिए मंदिर जीवन के प्रत्येक विषय से संबंधित हैं ।

– डॉ. मेधा कानेटकर, प्राध्यापिका, सी.पी. बेरार महाविद्यालय, नागपुर

(साभार : दीपावली, मंदिर विशेषांक २०२४)