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श्री प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, सनातन प्रभात

मुंबई — देश के अनेक राज्यों में ऐसा कोई कानून नहीं है, परंतु महाराष्ट्र में ‘भिक्षावृत्ति निरोधक कानून’ अस्तित्व में है । फिर भी राज्य के इस महत्त्वपूर्ण कानून की लगभग उपेक्षा की गई है । पिछले ७५ वर्षों में इस कानून में समयानुसार सामान्य सुधार भी नहीं किए गए हैं । वर्तमान स्थिति यह है कि पुलिस अभियान चलाकर भिखारियों को पकडती है, परंतु वे प्रतिभूति (जमानत) की राशि एवं वकीलों की फीस के रूप में सहस्रों रुपये देकर एक घंटे में छूट जाते हैं तथा पुनः भीख मांगने का व्यवसाय आरंभ कर देते हैं । महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अंतर्गत आनेवाले इस कानून में सरकार द्वारा समयानुसार कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन किए जाने आवश्यक हैं ।
मुंबई के स्वतंत्र राज्य रहने के समय बनाया गया ‘मुंबई भीख प्रतिबंध अधिनियम, १९५९’ महाराष्ट्र राज्य के गठन के उपरांत अन्य कानूनों की तरह यथावत स्वीकार कर लिया गया । वर्ष २०२५ में ‘भिखारी ग्रहण केंद्र’ में रहनेवाले भिखारियों के दैनिक भत्ते की राशि ५ रुपये से बढाकर ४० रुपये की गई; परंतु इसके अतिरिक्त इस कानून में आज तक कोई सामान्य सुधार भी नहीं किया गया ।
महाराष्ट्र में दूसरे राज्यों से आकर भीख मांगने का व्यवसाय !पुलिस के पकड अभियान में पकडे जानेवाले अधिकांश भिखारी बंगाल से होते हैं । इसके अलावा उत्तर प्रदेश, झारखंड एवं असम के भिखारी भी बडी संख्या में पाए जाते हैं, ऐसी जानकारी ‘भिखारी ग्रहण केंद्र’ के एक अधिकारी ने दी । रमजान के महीने में अन्य राज्यों से मुस्लिम भिखारी महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में, बडी संख्या में भीख मांगने आते हैं । इन भिखारियों के पास महंगे मोबाइल फोन भी होते हैं । |
पुलिस द्वारा भी अनदेखी !
राज्य में ‘भिक्षावृत्ति निरोधक कानून’ होने के उपरांत भी, भिखारियों की संख्या कम होने की अपेक्षा दिन-प्रतिदिन बढती जा रही है । इसका कारण यह है कि अधिकांश लोग भीख मांगने को व्यवसाय के रूप में कर रहे हैं । भीख मांगनेवाले कई गिरोह राज्य में सक्रिय हैं । उन पर कार्रवाई करने का अधिकार पुलिस को है; परंतु इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए गृह विभाग की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं होती । इसके लिए राज्य के भिखारियों का गृह विभाग द्वारा सर्वेक्षण कर इस कानून को वास्तविक अर्थों में लागू करना आवश्यक है ।
इस प्रकार की जाती है कार्रवाई !

इस कानून के अंतर्गत भिखारियों को पकडने के लिए पुलिस की स्वतंत्र टीमें होती हैं । पुलिस द्वारा पकडे जाने के उपरांत उन्हें पहले जिला दंडाधिकारी न्यायालय में प्रस्तुत किया जाता है । यदि यह प्रमाणित हो जाए कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में भिखारी है, तो दंडाधिकारी के निर्देशानुसार उसे ‘भिक्षुक ग्रहण केंद्र’ में रखा जाता है । महाराष्ट्र में ऐसे १४ ‘भिक्षुक ग्रहण केंद्र’ हैं, जो महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अंतर्गत आते हैं । इन केंद्रों में भिखारियों को लगभग एक वर्ष तक रखकर उन्हें हस्तकला, सिलाई, बागवानी आदि कौशल सिखाकर आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जाता है ।
इन केंद्रों में भिखारियों को चिकित्सीय उपचार, मानसिक परामर्श, राष्ट्रभक्ति की शिक्षा तथा मनोरंजन जैसी सुविधाएं प्रदान की जाती हैं । जिन भिखारियों में सुधार नहीं होता और जिनके कोई सगे-संबंधी (परिजन) नहीं मिलते, उन्हें आजीवन, अर्थात मृत्यु तक, सरकार की अनुमति से भिक्षुक सुधारगृह में रखा जाता है ।
व्यवसाय के रूप में भीख मांगनेवाले जमानत पर छूट जाने से प्रशासन असहाय !
पुलिस द्वारा पकडे जाने पर अधिकांश भिखारी भीख मांगने का अपराध स्वीकार कर लेते हैं; परंतु २,१०० रुपये की जमानत राशि और वकीलों की फीस भरकर एक घंटे में छूट जाते हैं और फिर से भीख मांगने लगते हैं । बार-बार पकडे जानेवाले तथा व्यवसाय के रूप में भीख मांगनेवालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान कानून में नहीं है । इसलिए कुछ पैसे खर्च कर भीख मांगना उनके लिए लाभदायक प्रमाणित हो रहा है । कुछ भिखारी तो जमानत के पश्चात तुरंत रिहाई न होने पर पुलिस को भी धमकाते हैं । कई बार ऐसे पेशेवर भिखारियों की जमानत कराने के लिए उनके गिरोह के साथी पैसे लेकर वहां उपस्थित रहते हैं ।
८० प्रतिशत से अधिक भिखारी नशे के अधिन !
अभियान के अंतर्गत पकडे जानेवाले ८० प्रतिशत से अधिक भिखारी नशीले पदार्थों के सेवन के आदी होते हैं । उनका उपचार और परामर्श कर उन्हें इस लत से बाहर निकालना पडता है, ऐसी जानकारी एक ‘भिक्षुक ग्रहण केंद्र’ के अधिकारी ने दी ।
तृतीयपंथी भिखारियों का क्या किया जाए ?
यदि पुलिस द्वारा पकडे गए भिखारियों में कोई तृतीयपंथी हो, तो उनके लिए ‘भिक्षुक ग्रहण केंद्र’ में कोई व्यवस्था नहीं है; क्योंकि मूल कानून में ही इसके लिए कोई प्रावधान नहीं है । इसलिए तृतीयपंथी भिखारियों को कहां रखा जाए, यह वर्तमान में राज्य के सामने एक बडी समस्या है । सामाजिक न्याय विभाग के अंतर्गत निराश्रित तृतीयपंथियों के लिए छात्रावास की व्यवस्था है; परंतु उन्हें ‘भिक्षावृत्ति निरोधक कानून’ के अंतर्गत पकडा गया होने के कारण वहां भेजा नहीं जा सकता । इस दृष्टि से कानून में संशोधन आवश्यक है ।
कानून में समयानुसार परिवर्तन आवश्यक !
महाराष्ट्र का यह कानून अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । पिछले कुछ वर्षों में राज्य के भिक्षुक ग्रहण केंद्रों से बाहर निकले कई भिखारियों ने अपना स्वयं का व्यवसाय भी आरंभ किया है । चेंबूर स्थित ‘भिखरी ग्रहण केंद्र’ में लाए गए एक महिला एवं पुरुष भिखारी का प्रशासन ने विवाह कराया । उनका बच्चा उसी केंद्र में नौकरी कर रहा है । इसी केंद्र से तीन वर्ष पहले लापता हुआ उत्तर प्रदेश का एक २३ वर्षीय युवक उसके माता-पिता को सौंपा गया । इस प्रकार ये ‘भिखरी ग्रहण केंद्र’ भिखारियों का जीवन परिवर्तित कर उन्हें सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीने योग्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं । इसे ध्यान में रखते हुए सरकार को गंभीरता से इस ओर ध्यान देकर कानून में समयानुसार परिवर्तन करना आवश्यक है ।
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