अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अनुचित प्रयोग पर न्यायालय की टिप्पणी !

प्रयागराज (उत्तरप्रदेश) – यदि किसी व्यक्ति को उसकी जाति के नाम से संबोधित किया जाता है; परंतु उसके पीछे अपमानित करने अथवा भयभीत करने का उद्देश्य न हो, तो उसे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता, ऐसा महत्त्वपूर्ण निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिया । न्यायालय ने अमय पांडे एवं अन्यों द्वारा प्रविष्ट की गई आपराधिक याचिका पर यह निर्णय सुनाया । इस प्रकरण में कनिष्ठ न्यायालय द्वारा निर्गत समन्स के आदेश को उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया; तथापि भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत कार्रवाई चालू रखने की अनुमति प्रदान की ।
१. वर्ष २०१९ में अमय पांडे एवं अन्यों के विरुद्ध अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत अभियोग पंजीकृत किया गया था । उन पर परिवादी के साथ मारपीट करने एवं जातीय टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया था ।
२. अभियुक्तों के पक्ष की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि, यह संपूर्ण प्रकरण विरोधाभासी है एवं दुर्भावनापूर्ण पद्धति से रचा गया है । परिवाद में प्रारंभ में जातीय अपशब्दों अथवा अपमान का कोई उल्लेख नहीं था । यह एक विवाह समारोह के समय हुआ सामान्य विवाद एवं मारपीट का प्रकरण था ।
३. दोनों पक्षों के तर्क सुनने के पश्चात न्यायालय ने कहा कि, इस प्रकरण की पृष्ठभूमि एक निजी विवाद से संबंधित प्रतीत होती है । अतः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का प्रयोग उचित संदर्भ में किया गया हो, ऐसा स्पष्ट नहीं होता ।
४. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम लागू करने के लिए यह आवश्यक है कि, अभियुक्त ने जानबूझकर पीड़ित का उसकी जाति के आधार पर अपमान किया हो अथवा उसे भयभीत किया हो । साथ ही यह कृत्य सार्वजनिक स्थान पर अथवा जनसमूह के समक्ष घटित हुआ होना चाहिए ।
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