वर्ष २०१२ से २ सहस्र ९०० करोड रुपये का अनुदान लंबित !
श्री. प्रीतम नाचणकर, विशेष प्रतिनिधि, सनातन प्रभात

मुंबई, ३० अप्रैल (वार्ता.) – शिक्षा का अधिकार (राईट टू एज्युकेशन) अधिनियम के अंतर्गत निजी बिना अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों के लिए विद्यालयों में २५ प्रतिशत स्थान आर्थिक रूप से दुर्बल अथवा वंचित वर्ग के विद्यार्थियों हेतु आरक्षित रखना अनिवार्य है । ‘इन आरक्षित स्थानों की प्रतिपूर्ति (अनुदान की राशि) सरकार द्वारा दी जाए’, ऐसा इस अधिनियम में प्रावधान है । सरकार ने विद्यार्थियों हेतु २५ प्रतिशत आरक्षित स्थान अनिवार्य तो कर दिए हैं; किंतु प्रतिपूर्ति की राशि प्रदान करने में सरकार द्वारा टालमटोल की जा रही है । वर्ष २०१२ से राज्य के शैक्षणिक संस्थानों की प्रतिपूर्ति के २ सहस्र ९०० करोड रुपये सरकार ने लंबित रखे हैं ।
Sanatan Prabhat Exclusive:
📚 RTE Crisis in Maharashtra: ₹2,900 Cr Unpaid!25% reservation for EWS students exists in private unaided schools, but the State Govt hasn’t paid subsidies.
₹2,900 crore pending since 2012
Burden shifts to other students or pushes schools toward… pic.twitter.com/3MwZktlmI1
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) April 30, 2026
शिक्षा अधिकार अधिनियम के अंतर्गत निजी बिना अनुदान प्राप्त विद्यालयों के आरक्षित स्थानों के मानकों में राज्य के ८ सहस्र ७०१ विद्यालय सम्मिलित हैं । उनमें १ लाख १४ सहस्र ८२६ स्थान विद्यार्थियों हेतु आरक्षित हैं । वर्तमान स्थिति में प्रत्येक विद्यार्थी हेतु एक वर्ष के लिए १७ सहस्र ६७० रुपये अनुदान निर्धारित किया गया है । इन विद्यार्थियों का विवरण संबंधित शैक्षणिक संस्थानों द्वारा सरकार को ऑनलाइन प्रस्तुत किया जाता है तथा उसके अनुसार अनुदान की राशि निश्चित की जाती है ।

प्रतिपूर्ति की राशि ७५० करोड, किंतु निधि केवल २२० करोड रुपये ! – शिक्षा विभाग
केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा विभाग की कुल निधि में से २ प्रतिशत राशि ‘आर.टी.ई.’ के अंतर्गत प्रतिपूर्ति हेतु प्रदान की जाती है । महाराष्ट्र में कुल विद्यार्थियों की प्रतिपूर्ति हेतु एक वर्ष में सामान्यतः ७५० करोड रुपये की आवश्यकता होती है; किंतु इस वर्ष के बजट में २२० करोड रुपये स्वीकृत किए गए हैं । प्रतिवर्ष सामान्यतः बजट में शैक्षणिक संस्थानों की प्रतिपूर्ति हेतु २०० करोड रुपये दिए जाते हैं, ऐसी जानकारी शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने दी । कुल प्रतिपूर्ति की तुलना में दी जाने वाली राशि अत्यंत अल्प होने के कारण प्रतिवर्ष प्रतिपूर्ति की करोड़ों रुपये की राशि शेष रह जाती है ।
अन्य विद्यार्थियों पर अतिरिक्त शुल्क का भार !
किसी शैक्षणिक संस्थान के संचालन हेतु शिक्षक-कर्मचारियों का वेतन, आधारभूत संरचना, शैक्षणिक सामग्री आदि के लिए अधिक मात्रा में निधि की आवश्यकता होती है । विद्यार्थियों का प्रवेश शुल्क तथा दान ही शैक्षणिक संस्थानों की निधि के स्रोत हैं । सरकार से प्रतिपूर्ति की राशि प्राप्त न होने पर भी, संस्थान चलाने हेतु कोई अन्य व्यवस्था करने के अतिरिक्त विकल्प शेष नहीं रहता । अतः शैक्षणिक संस्थान यह आर्थिक भार अन्य विद्यार्थियों पर डाल देते हैं एवं उनसे अधिक प्रवेश शुल्क एवं दान लेते हैं । कुछ शैक्षणिक संस्थान आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं, तो कुछ व्यावसायिक उद्देश्य रखकर कार्य करते हैं; परंतु आर्थिक रूप से दुर्बल, विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों के शैक्षणिक संस्थानों को आर्थिक संकट का सामना करना पडता है ।
मिथ्या सूचना के आधार पर अल्पसंख्यक स्तर प्राप्त करने का प्रयास !
यदि शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक स्तर प्राप्त हो जाता है, तो उन्हें ‘आर.टी.ई.’ के अंतर्गत २५ प्रतिशत आरक्षित स्थानों के नियम से मुक्ति मिल जाती है । अतः वर्तमान में शैक्षणिक संस्थान अल्पसंख्यक स्तर प्राप्त करने हेतु प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं । (धर्म एवं भाषा के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक स्तर प्रदान किया जाता है ।) परिणामस्वरुप, विद्यार्थियों की कल्पित संख्या दिखाकर अल्पसंख्यक स्तर प्राप्त करने के अनेक प्रकरण राज्य में उजागर हुए हैं ।
सरकार द्वारा नीति निर्धारित करना आवश्यक !
यदि कोई निजी संस्थान आर्थिक रूप से सक्षम हो तथा उन्हें प्रतिपूर्ति की राशि की आवश्यकता न हो, अथवा कोई शैक्षणिक संस्थान आर्थिक रूप से दुर्बल कितने विद्यार्थियों हेतु स्थान आरक्षित रख सकता है, इसका अध्ययन कर सरकार को इस विषय में नीति निर्धारित करना आवश्यक है । किंतु प्रतिपूर्ति का नियम स्वयं बनाना तथा उसकी निधि १४ वर्षों तक रोके रखना, इससे सरकार की छवि तो धूमिल हो ही रही है; साथ ही शैक्षणिक संस्थान भी अनुचित मार्ग पर जा रहे हैं । इस ओर सरकार को गंभीरता से ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है ।
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