
नई दिल्ली – संस्कृत मात्र एक भाषा नहीं है । भारत में ‘संस्कृत’ राष्ट्र की आत्मा है; क्योंकि वह विचार, जीवन एवं संस्कृति की सबसे प्राचीन परंपरा है, जो आज भी जीवित है । भारतीयों को यदि अपना कर्तव्य पूर्ण करना हो, तो भारत को समझना पडेगा । स्वयं को भारत बनना पडेगा । भारत को समझना है, तो उसके लिए संस्कृत भाषा को जानना अनिवार्य है, ऐसा मार्गदर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने किया । वे यहां ‘संस्कृत भारती’ संस्था के मध्यवर्ती कार्यालय के उद्घाटन के अवसर पर ऐसा बोल रहे थे । यह संस्था संस्कृत को एक जीवंत एवं व्यापकता के साथ उपयोग की जानेवाली भाषा के रूप में प्रोत्साहन देने के लिए समर्पित है ।
प.पू. सरसंघचालक द्वारा रखे गए सूत्र
वातावरण एवं नियमित उपयोग के कारण भाषा सीखना सुलभ बन जाता है ।
मेरे बचपन में जब विद्यालय में संस्कृत सिखाई जाती थी, तब वह कठिन लगती थी । पाठ्यक्रम में श्लोक कंठस्थ करने पडते थे, जिसके कारण संस्कृत एक कठिन भाषा होने की धारणा बनी; परंतु वही श्लोक जब घर में नैसर्गिक पद्धति से सुनने में आते थे, तब वे कभी भी कठिन नहीं लगे । यही समस्या आज भी है । छात्रों को संस्कृत एक कठिन भाषा लगती है, परंतु प्रश्न यह शेष रहता है कि वह इतनी कठिन क्यों लगती है ? वास्तव में कोई भी भाषा सीखने की सबसे सरल एवं प्रभावी पद्धति क्रमिक पुस्तकें नहीं, अपितु संवाद है । भाषा सिखाना वातावरण से तथा उसके नियमित उपयोग से सुलभ बन जाता है ।
भाषा सीखने की सर्वाेत्तम पद्धति है, उस भाषा के बोलनेवाले लोगों में घुल-मिल जाना।
जब मैं पूरे भारत की यात्रा करता हूं, तब मुझे विभिन्न भाषाओं के विशिष्ट शब्द भले ही ज्ञात नहीं होते, तब भी उसके पीछे की भावना एवं अर्थ समझ लेना संभव होता है । कोई भी भाषा निरंतर सुनने से तथा उसे बोलने से नैसर्गिकरूप से आत्मसात होती है । अतः भाषा सीखने की सर्वाेत्तम पद्धति यह है कि उस भाषा के बोलनेवाले लोगों में घुल-मिल जाना, उनसे वह भाषा सुनना तथा निरंतर बोलना ।
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