

‘इअर पॉड’ (भ्रमणभाष सुनने के लिए कान में डालने का छोटे आकार का बिनातार का एक यंत्र), सतत ‘स्क्रीन’ (भ्रमणभाष की ओर) देखना अथवा देखना अनिवार्य हो जाना, इससे ज्ञानेंद्रियों की हानि होती ही है । साथही ‘सर्वायकल स्ट्रेन’ (गरदन के स्नायुओं में आनेवाली चोट) और जबडे के जोडों की ऐंठन, जैसे कष्ट होते हैं । सतत ‘इअर पॉड’ का उपयोग करना, उन्हें कान में डालकर रखना तथा एक ही स्थान पर देखते रहना, इससे गरदन में रीढ की हड्डियों पर अधिक तनाव आता है, इसे कहते है ‘टेक नेक’ ! इसके अतिरिक्त ‘इअर बड’ अपने स्थान पर रहें, इसलिए अनजाने में जबडे का जोड अपनेआप कसकर पकडा जाता है और लगातार अनेक दिनों तक उसका उपयोग किए जाने से उस जोड में वेदना तथा उससे संबंधित स्नायुओं में वेदनाओं को लेकर रोगी आ रहे हैं । (temporomandibular joint clenching).
प्रतिदिन जिम में (आधुनिक व्यायाम शाला में) ‘स्ट्रेंथ ट्रेनिंग’ करते समय, अर्थात व्यायाम के अंतर्गत वजन उठाते समय स्नायुओं पर आया अतिरिक्त तनाव, ‘इअर बड’ का जबडे के जोडों पर आनेवाला तनाव, उसे संभालने के लिए अनजाने में अपनाया जा रहा अयोग्य ‘पोश्चर’ (शरीर की स्थिति) आदि का परिणाम होकर ‘लॉक जॉ’ (जबडे जोडों में अकडन/लगातार वेदना) हो सकता है । जितना सह पाएं, उतना ही व्यायाम शांत चित्त से करें और धीरे-धीरे उसे बढाते जाएं । आदत अथवा आवश्यकता के रूप में निरंतर ‘स्क्रीन टाइम’ गरदन और कंधे के स्नायुओं के लिए कष्टदायक है, यह सभी जानते ही हैं; परंतु निरंतर लगाए जा रहे ‘इअर बड’ उसे और बढावा देते हैं । यह बात घर की अगली पीढी के ध्यान ला देना अत्यंत आवश्यक है ।
– वैद्या (सौ.) स्वराली शेंड्ये, यशप्रभा आयुर्वेद, पुणे. (२८.३.२०२६)
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