साधको, मन की संकल्प-विकल्प (संदेह) की अवस्थाओं में उलझकर साधना से दूर न जाते हुए, इस संधिकाल का साधना के लिए लाभ उठाएं ! – श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी

१. रामनाथी, गोवा का सनातन का आश्रम वैकुंठ जैसा स्थान है तथा साधकों को उनके पूर्वपुण्य से ही वहां रहने का अवसर मिलता है !

‘साधको, रामनाथी, गोवा का सनातन आश्रम वैकुंठ समान स्थान है । आपको साधना के लिए ऐसा स्थान मिला है । आप माया का विचार कर इस आश्रम से कभी बाहर न जाएं । ‘हम सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के निकट हैं’, इसका नित्य स्मरण रखें । आपने यह सौभाग्य आपके पूर्वपुण्य से प्राप्त किया है; परंतु अब आपको इस पुण्य को स्वयं के लिए ही टिकाए रखना है । बडी अनिष्ट शक्तियां हमारे मन में विचार डालकर माया का आकर्षण उत्पन्न करती हैं । यही हमारे लिए आपातकाल है । जब हम आश्रम की सीमा लांघ देते हैं, तब माया का विश्व तैयार होता है । यह काल बहुत कठिन है तथा इस काल में टिके रहने के लिए उतनी हमारी साधना नहीं है । ईश्वर ने अब साधना करनेवालों के लिए एक छलनी लगाई है ।

श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी

२. ‘संकल्प-विकल्प आना’ मन का कार्य होने से साधक संदेह में बिना उलझे इस संधिकाल में साधना कर ईश्वर की कृपा प्राप्त करें !

साधको, इस बात को ध्यान में रखें, ‘संकल्प-विकल्प आना मन का कार्य ही है । इसलिए मन में चाहे संदेह उत्पन्न हो; परंतु हमें मन को यह बताना है, ‘चाहे कुछ भी हो जाए; परंतु मैं सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी के चरण नहींछोडूंगा ।’ आश्रम में रहनेवाले साधकों ने वही रहकर साधना की, तो धीरे-धीरे उन्हें ‘साधना का ‘लाभांश’ (बोनस) मिलता जाएगा ।

इसका कारण यह है कि संपत्काल में साधना करना सुलभ होता है; परंतु आपातकाल में हमने थोडी-सी भी साधना की, तो ईश्वर को लगता है, ‘इस काल में तो कोई साधना नहीं करता; परंतु ये साधक साधना कर रहे हैं न, तो हम उन्हें ‘लाभांश’ (बोनस) देंगे ।’ इसका अर्थ यह है कि इस संधिकाल में की गई साधना के कारण साधकों को अल्प समय में ही ‘लाभांश’(बोनस) मिलनेवाला है । हमारे लिए यह बडा अवसर है । संकल्प-विकल्प मन की अवस्थाएं हैं, जिनके दूर होने में कुछ वर्ष लगेंगे; क्योंकि वह एक बडी तपस्या ही है ।

किसी बात के पीछे का सूक्ष्म का कार्यकारणभाव हमें १० वर्ष पश्चात भी समझ में आ सकता है । अतः साधक मन में बिना कोई संदेह रखे साधना करें, अन्यथा संदेह-शंकाओं में ही हमारा जीवन पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा तथा उससे हमारी साधना की बहुत हानि होगी !’

– श्रीचित्‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळजी, कांचीपुरम्, तमिलनाडु  (२१.९.२०२५)