SC Stray Dogs : आवारा कुत्तों पर कार्रवाई को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय सुरक्षित रखा

राज्य सरकारें काम नहीं कर रहीं एवं सिर्फ हवा में किले बना रही हैं ! – न्यायालय


नई दिल्ली – सर्वोच्च न्यायालय ने २८ जनवरी को आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर राज्य सरकारों को कडी फटकार लगाई । आवारा कुत्तों की नसबंदी से संबंधित न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का ठीक से पालन न किए जाने पर न्यायालय ने कहा कि सरकारें जमीनी स्तर पर काम करने की अपेक्षा केवल बातें कर रही हैं एवं हवा में किले बना रही हैं । न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता तथा न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि कई राज्यों ने केवल कागजी रिपोर्टें प्रस्तुत की हैं, जबकि वास्तविक कार्य नहीं हुआ है । न्यायालय ने इस प्रकरण में श्वान ( कुत्ता) प्रेमियों, कुत्तों के काटने से पीडित लोगों, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के तर्क सुनने के उपरांत आवारा कुत्तों पर कार्रवाई को लेकर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया । साथ ही सभी पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपने लिखित बयान न्यायालय में जमा करने का निर्देश दिया गया ।

सर्वोच्च न्यायालय को राज्य सरकारों से अपेक्षित कदम

१. आवारा कुत्तों की नसबंदी की संख्या बढाना आवश्यक था ।

२. जन्म नियंत्रण (नसबंदी) केंद्रों की संख्या बढाना आवश्यक था ।

३. आश्रय (शेल्टर) केंद्र तैयार करना आवश्यक था ।

४. विद्यालयों, चिकित्सालयों जैसे संवेदनशील परिसरों में बाड लगाना आवश्यक था ।

५. सडकों एवं राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा जानवरों को हटाना आवश्यक था ।

न्यायालय द्वारा उठाए गए महत्त्वपूर्ण बिंदु

१. हमें जानकारी मिली है कि बिहार में ३४ जन्म नियंत्रण केंद्र हैं तथा लगभग २० सहस्र (हजार) कुत्तों की नसबंदी की गई है । परंतु यदि राज्य में ६ लाख से अधिक कुत्ते हैं, तो यह संख्या बहुत ही कम है ।

२. असम को छोडकर किसी भी राज्य ने यह नहीं बताया कि कुत्तों के काटने से कितने लोग घायल हुए हैं ।

३. हम राज्यों से अस्पष्ट एवं अधूरे उत्तर स्वीकार नहीं करेंगे ।

४. अनेक विद्यालयों, चिकित्सालयों एवं सरकारी भवनों में अब तक बाड नहीं लगाई गई है ।

५. न्यायालय ने २८ जनवरी को बिहार एवं असम के साथ गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, झारखंड तथा गुजरात की दलीलें सुनीं, जबकि २९ जनवरी को पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश एवं तेलंगाना की रिपोर्टों पर सुनवाई की ।

संपादकीय भूमिका 

इससे सरकारी तंत्र कैसे काम करता है, यह साफ दिखाई देता है !